मरीज के इलाज के लिए चलाई एक डॉक्टर की मुहिम रंग लाई
Editor : Mini
 22 Jan 2020 |  123

डॉक्टर की कलम से-
नई दिल्ली
एप्लास्टिक एनीमिया के शिकार एक मरीज का एम्स में सिर्फ इसलिए इलाज नहीं हो पा रहा था, क्योंकि वह बीपीएल कार्ड धारक था और आयुष्मान योजना का कार्ड बनावा रखा था, जिसकी वजह से वह महंगी बोन मैरो प्रत्यारोपण का लाभ नहीं ले सकता था, क्योंकि आयुष्मान भारत योजना के नियमों में सीधे तौर पर केवल पांच लाख रुपए तक के इलाज की ही बात कही गई है साथ ही जिस मरीज के पास आयुष्मान कार्ड होगा वह राष्ट्रीय आरोग्य निधि का लाभ नहीं ले सकता, जिसके तहत दस लाख तक की आर्थिक सहायता मिल सकती है। इस बावत एम्स के जेरिएट्रिक विभाग के रेजिडेंड डॉक्टर विजय गुर्जर ने एक मुहिम शुरू की, पीएमओ से लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय तक पत्र भेजे, इस बावत दिल्ली हाई कोर्ट में दर्ज एक पीआईएल की सुनवाई में मरीज के पक्ष में आदेश भी जारी किया गया है। 17 जनवरी को हुई सुनवाई में कोर्ट ने एम्स को मरीज का इलाज तुरंत शुरू करने को कहा है। चिकित्सक इस केस को आधार मानकर आयुष्मान भारत की खामियां दूर करने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे सभी मरीजों को लाभ मिल सकेगा। आगे डॉक्टर विजय गुर्जर की कलम से-

"उन्हें आज कोर्ट का आदेश मिला, उसको लेकर वह ऐम्स आए खुश हैं वह भी कि उनकी मेहनत रंग लाई है,
हां उन्हें परेशानियां तो बहुत उठानी पड़ी
ब्लड कैंसर वाले मरीज को एम्स में लाना बार-बार साथ में कोर्ट के भी चक्कर लगाना बार-बार
लेकिन भला हो वकील साहब का जिन्होंने ने कम से कम परेशान किया और इनके दर्द को समझते हुए इनसे एक पैसा लिए बिना इनका केस कोर्ट में लड़ा
लेकिन यह भी यही कह रहे हैं कि हमारा तो काम हो जाएगा शायद
लेकिन उन बाकी परिवारों का क्या होगा क्योंकि यह छोटी सी कमी बहुत से मरीजों की जान पर भारी पड़ रही है
आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले कई महीनों से इन्होंने अपना घर बार छोड़ा हुआ है बिहार से यहां दिल्ली आए हुए हैं इलाज के लिए और आयुष्मान भारत कार्ड के चक्कर में सिर्फ एक छोटी सी कमी की वजह से इतनी अच्छी योजना का लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा था
शायद मंत्रालय में बैठे सरकारी बाबू को समझ आ जाएगा
नहीं तो हर मरीज को ऐसे ही कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ेंगे
स्वास्थ्य मंत्री जी को भी सब पता है लेकिन वह भी शायद ज्यादा ही व्यस्त हैं उनके पास आयुष्मान भारत की उपलब्धियों के बारे में ट्वीट करने के लिए समय है
लेकिन उसमें जो कमियां हैं जिन्हें दूर किया जा सकता है पिछले 1 साल से भी ज्यादा समय से वह कर्मियों ने बार बार बताई जा चुकी हैं
लेकिन फिर भी शायद आंखें मूंदकर अपने कान बंद करके बैठे हैं
सरकार में मंत्री बनकर यही करना होता है क्या?
सरकारी मंत्रालय में बैठकर ऐसे ही नीतियां बनाई जाती है क्या?
एक योजना दूसरी योजना से टकरा जाए और मरीज को किसी का भी लाभ ना मिल पाए?
क्या यही गुड गवर्नेंस है?
चलिए छोड़ देते हैं इसके लिए लड़ते रहेंगे
आज एक खुशी मिली है इस माताजी के चेहरे पर खुशी देखने पर बहुत ही अच्छा लगा
बहुत दिन बाद लगा कि अगर आप कोशिश करते हैं तो कुछ ना कुछ तो हल जरूर निकलता है
बहुत से लोग कई बार पूछते हैं कि इतना सब करके तुम्हें क्या मिलता है
यह जो चेहरे पर इनके मुस्कान हैं ना
बस यही मिलती है
कोशिश यही रहती हैं कि किसी रोते हुए को हंसाया जाए
क्यों ना फिर सिस्टम से टकराया जाए"
आपका बहुत-बहुत शुक्रिया
डॉ. विजय गुर्जर
जेरिएट्रिक विभाग एम्स


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