प्लाज्मा थेरेपी कोरोना वायरस के प्रभाव को कम करने में कारगर है
Editor : Mini
 24 Apr 2020 |  120

नई दिल्ली,
आईसीएमआर की सहमति के बाद दिल्ली सरकार ने भी कोरोना संक्रमित मरीजों में प्लाज्मा थेरेपी का प्रयोग शुरू किया है। लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल मे भर्ती पहले चार मरीजों पर किए गए इस प्रयोग के परिणाम काफी संतोषजनक देखे गए हैं। दिल्ली सरकार के ऑटोनॉमस केन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बायलरी साइंसेस के निदेशक डॉ. शिव कुमार के नेतृत्व में प्लाज्मा थैरेपी का प्रयोग किया जा रहा है। जिसमें सहयोगी डॉ. मीनू वाजपेयी इस प्रोजेक्ट की मुख्य परीक्षक हैं। एक अन्य सहयोगी डॉ. सुरेश हैं, जो डॉ. मौलाना आजाद अस्पताल में निदेशक और प्रोफेसर हैं। वह बहुत ही वरिष्ठ फिजिशियन भी हैं। प्लाज्मा थैरेपी से जुड़े विभिन्न पहलूओं पर डॉ. शिव कुमार सरीन से विस्तृत बातचीत हुई। पेश हैं कुछ अंश-

कोरोना मरीजों में प्लाज्मा थैरेपी के प्रयोग की योजना कैसे बनी?
सबसे पहले हम सब ने मिल कर एक प्राथमिक योजना बनाई थी। उस समय तक योजना थी कि सिर्फ पुराने सांस के या गंभीर मरीजों के लिए थैरेपी इस्तेमाल की जाएगी। वैसे तो यह पुरानी थैरेपी है और डिप्थिरिया में भी इस्तेमाल की गई थी। चूंकि वायरस की कोई दवाई नहीं है और हमारे पास ऐसी कोई दवाई नहीं हैं कि वायरस शरीर में प्रवेश करे तो उसे आगे बढ़ने से रोक सकें। एक ही थैरेपी थी कि वायरस को कैसे निष्प्रभाव करें या उसके प्रभाव को कैसे कम करें।

कोरोना की किस स्टेज में प्लाज्मा थैरेपी का प्रयोग होता है?
कोरोना बीमारी के तीन फेज होते हैं। पहला, वायरस फेज कहते हैं। इसमें वायरस शरीर के अंदर आता है। दूसरा, इसे पल्मोनरी फेज कहते हैं। जिसमें फेफड़े के अंदर जख्म आने लगते हैं। उसके कारण मरीज को सांस की परेशानी होने लगती है। तीसरा, इसमें साइकोकाइन निकलते हैं। अगर मरीज तीसरे स्टेज में आता है, तो उसके अंगों को फेल होने की स्थिति आ जाती है। मरीज दूसरे फेज में आता है, जिसमें फेफड़े के अंदर संक्रमण है, लेकिन बाकी अंग चल रहे हैं। उस स्टेज के अंदर अगर हम प्लाज्मा दें, तो वायरस को भी कम कर सकते हैं और अंगों को फेल होने से बचा सकते हैं। प्रथम, स्टेज में यह पकड़ में नहीं आता है। हम सिर्फ बचाव व पता लगा सकते हैं।
इसके लिए मरीज का किस स्टेज में अस्पताल पहुंचना जरूरी है?
अगर मरीज 7 से 15 दिन के अंदर आ जाए, जिसे सांस की परेशानी है और उसमें बाकी अंग फेल नहीं हो, ऐसे व्यक्ति में प्लाज्मा थैरेपी कारगर हो सकता है। हमने शुरू में इसका परीक्षण बहुत ही सावधानी पूर्वक शुरू किया था और हमें खुशी है कि चार मरीजों में उत्साह वर्धक परीणाम आए हैं। एलएनएच अस्पताल में भर्ती और दो-तीन मरीजों को आज हम प्लाज्मा थैरेपी दे सकते हैं।
और क्या खासियत है इस थैरेपी की?
इस थैरेपी के फायदे काफी हैं। अगर मरीज को यह थैरेपी दी जाए, तो वह तीसरे स्टेज, जिसे हम साइकोकाइन स्पॉर्म कहते हैं, उस स्टेज पर मरीज न जाए, जिससे अंग फेल हों और फेफड़े के संक्रमण तेजी से ठीक किया जा सकता है। यह हमारा मुख्य उद्देश्य है। ऐसी थैरेपी अभी और कोई नहीं है। मान लीजिए कि हमें 20 मरीजों में थैरेपी करनी है, तो मुझे लगता है कि हमारे यह मरीज 10 से 15 दिन में ठीक हो जाएंगे। सभी की दुआएं रहीं, तो हो सकता है कि हम एक लीड ले सकते हैं कि यह थैरेपी अच्छी है।

प्लाज्मा देने से डोनर को कोई किसी तरह की कोई कमजोरी होती है?
प्लाज्मा थैरेपी में अभी कई दिक्कतें हैं। जिन लोगों को कभी कोरोना हुआ और रिकवर हो गए हैं, लेकिन अभी वे क्वारंटीन में हैं। अगर वो लोग हमें ब्लड देंगे, तभी तो हमें एंटी बॉडिज मिलेगी। इस समय हमें उन लोगों की जरूरत हैं कि वे अपनी देशभक्ति दिखाएं। कुछ दिन पहले एक युवा लड़का था। वह रात एक बजे आया। हमें उस समय प्लाज्मा की सख्त जरूरत थी। हम चाहते थे कि किसी तरह से उसे प्लाज्मा मिल जाए, लेकिन हमें पूरे दिन प्लाज्मा नहीं मिला और अगले दिन सुबह 4 बजे उसकी मौत हो गई। उस दिन हमें सुबह 7 बजे प्लाज्मा मिल पाया। दिन भर पूरी टीम उदास रही कि क्या हमारे यहां ऐसे लोग नहीं हैं, जो कोरोना से ठीक होकर घर पर हैं, क्या वो ब्लड नहीं दे सकते हैं। डॉ सरीन ने कहा कि यह ब्लड डोनेशन भी नहीं है। जैसे हमने कई बार ब्लड दे दिया तो कोई भी मरीज ट्रांसप्लांट का होता है, सबसे पहले उसे हम ब्लड दे देते थे। इसके बाद हमें दोबारा ब्लड देने के लिए तीन महीने तक इंतजार करना पड़ता है। आपने देखा होगा कि डेंगू के लिए ब्लड से प्लेटलेट्स निकाल लिया जाता है और बाकी ब्लड शरीर के अंदर आ जाता है। उसी तरह प्लाज्मा के अंदर भी एक मशीन होती है। खून उसमें से जाता है और थोड़ा सा एंटी बॉडिज लिया जाता है और बाकी खून वापस आ जाता है। इसमें कोई कमजोरी नहीं होती है। अगर आप चाहें, तो 10 दिन बाद दोबारा प्लाज्मा दे सकते हैं। लेकिन ब्लड तीन महीने तक नहीं दे सकते हैं।
प्लाज्मा डोनेट करने वालों की सुरक्षा कितनी होती है?
अगर आप ब्लड देते हैं, तो आप में नया खून बनता है। आप जवान महसूस करते हैं। लंबी आयु के लिए ब्लड डोनेशन एक अच्छा माध्यम है। हमारी जिम्मेदारी है कि ब्लड देने वाले को कोई नुकसान न हो। पहले उसका हीमोग्लोबिन चेक होता है, वजह या कोई लक्षण नहीं है आदि पूरा चेक करने के बाद लिया जाता है। हमारे लिए डोनर की सुरक्षा ज्यादा जरूरी है। मैं आप से अपील करना चहता हूं कि आप सभी लोग ब्लड दान करने के लिए आगे आएं। अगर हम प्लाज्मा डोनेट कर दें, तो मुझे लगता है कि हम सारे मरीजों में इसका प्रयोग कर सकते हैं। अभी यहां दो दर्जन से अधिक मरीज हैं और हो सकता है कि सभी को इसकी जरूरत हो। आप लोग आगे आएं और हमें प्लाज्मा डोनेट करें। हमारी टीम मरीज के उपर पूरी जी-जान से लग कर उनको सुपरवाइज करेगी, उनको प्लाज्मा आदि देने पर, हो सकता है कि वे ठीक हो जाएं। प्लाज्मा थैरेपी का एक और फायदा है। इसमें ज्यादा खर्चा नहीं है। विदेश से मंगाई जाने वाली दवा काफी खर्चीली है। हम लोग इसे नहीं ले सकते हैं। प्लाज्मा थैरेपी उसके मुकाबले में काफी कम खर्चीली है। अगले दिनों में हम काफी अच्छी परिणाम बता सकेंगे।


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