लॉकडाउन ने 51.6 प्रतिशत को गंभीर तनाव का शिकार बनाया
Editor : Mini
 05 Jun 2020 |  19

नई दिल्ली,
मार्च महीने से जारी लॉकडाउन के दौरान देशभर में लोग पचास से अधिक दिन तक घरों में कैद रहे। अब कई जगह लॉकडाउन में ढील दी गई है। लेकिन लॉकडाउन का यह कोरोना काल बहुत से लोगों को तनाव की गर्त में ढकेल गया। एपिडेमोलॉजी इंटरनेशनल में प्रकाशित शोधपत्र में कोरोना काल और लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पर एक शोधपत्र प्रकाशित किया गया है। जिसमें आयुष मंत्रालय, सहित मौलाना आजाद मेडिक कॉलेज के कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के प्रमुख और कोरोना टास्ट फोर्स के प्रमुख डॉ. जुगल किशोर सहित कई विशेषज्ञ शामिल रहे।
कोरोना काल के समय लगाया गया लॉकडाउन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर किस तरह असर कर रहा है, इस बात का पता लगाने के लिए कोविड 19 पेंडेमिक और फिलिंग डिप्रेस्ड नामक अध्ययम के तहत एक ऑन लाइन सर्वेक्षण कराया गया। जिसमें 500 लोगों से लॉकडाउन के समय उनके मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न प्रश्न किए गए। 500 में से 478 प्रतिभागियों ने सर्वेक्षण में सक्रिय भूमिका निभाई और पूछे गए प्रश्नों का जवाब दिया। पब्लिक हेल्थ क्वश्नायर के अनुसार 28 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वह तनाव महसूस कर रहे हैं, जबकि 51.6 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वह गंभीर तनाव की दशा से गुजर रहे हैं। भविष्य की अनिश्चितता के कारण वह चैन की नींद नहीं सो पा रहे हैं। अप्रैल 15 से एक मई के बीच ऑनलाइन भेजे गए प्रश्नों के लोगों से ऑनलाइन ही जवाब मांगे गए। सर्वेक्षण में 18 साल से अधिक उम्र के सभी आयुवर्ग के लोगों ने भाग लिया। सर्वेक्षण में 54.8 प्रतिशत पुरूष और 45.2 प्रतिशत महिलाओं ने भाग लिया। 18 से 72 साल की आयु वर्ग के प्रतिभागियों में तीस प्रतिशत युवाओं ने मानसिक तनाव संबंधी अपने जवाब दिए।

सर्वेक्षण के प्रमुख आंकड़े
52.7 प्रतिशत प्रतिभागी परास्नातक शिक्षित थे
54.2 प्रतिशत अपर इनकम ग्रुप के लोग थे
55.9 प्रतिशत लोग निजी प्राइवेट कंपनी में उच्च पद पर काम करने वाले थे
66.7 प्रतिशत हिंदू धर्म मे विश्वास करने वाले थे।
91.2 प्रतिशत ईश्वर एक है में आस्था रखने वाले थे।

"लॉकडाउन के दौरान लोगों में तनाव का स्तर बढ़ा हुआ देखा गया, सर्वेक्षण इस आश्य से किया गया कि महामारी में लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य योजनाएं तैयार की जाएं, जिससे लोगों को तनाव से दूर रखा जा सके। सर्वेक्षण में 51.6 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वह गंभीर तनाव के शिकार हैं, हालांकि यह वह लोग थे, जो अनस्किल्ड और अशिक्षित थे।"
डॉ. जुगल किशोर, प्रमुख कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग, वर्धमान महावीर पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग अस्पताल



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