पुरुष रथी तो नारी सारथी- सीता अन्नदानम 
| 7/3/2023 3:39:20 PM

Editor :- Mini

नई दिल्ली, 

राष्ट्र सेविका समिति की आद्य संचालिका वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर के118 वें जन्मदिवस उत्सव पर मेधाविनी सिंधु सृजन, दिल्ली प्रांत द्वारा हंसराज कॉलेज कॉलेज में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। समिति इस दिन को संकल्प दिवस के रूप में मनाती आई है। कार्यक्रम की मुख्य वक्ता माननीय सीता अन्नदानम (अखिल भारतीय प्रमुख कार्यवाहिका, राष्ट्र सेविका समिति), अध्यक्षा दीदी मां साध्वी ऋतंभरा (अधिष्ठात्री वात्सल्य ग्राम) तथा तख्य अतिथि के रूप में माननीय कृष्ण गोपाल जी (सह कार्यवाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)उपस्थित थे।  मेधाविनी सिंधु सृजन की संयोजिका प्रो. निशा राणा ने कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत की तथा बताया कि विगत 10 वर्षों से मेधाविनी सिंधु सृजन प्रबुद्ध वर्ग की बहनों के साथ लगातार इस कार्य में गतिमान है। कार्यक्रम में'हिंदू प्रकाश में महिला विमर्श" नामक पुस्तक का भी इस कार्यक्रम में विमोचन किया गया ।

मुख्य वक्ता माननीय सीता अन्नदानम (राष्ट्र सेविका समिति) अखिल भारतीय प्रमुख कार्यवाहिका जी ने राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका और प्रथम संचालिका के विषय में कहा कि समर्पण का भाव राष्ट्रहित के लिए होगा तो राष्ट्र उन्नति करेगा। उन्होंने कहा कि परिवार रूपी रथ का पुरुष रथी  है तो स्त्री सारथी है, जिस प्रकार भगवान कृष्ण महाभारत में अर्जुन के सारथी थे और उनके दिशा-निर्देशों पर ही अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता उसी प्रकार स्त्री भी परिवार की सारथी होती है उसका सम्मान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्र सेविका समिति महिलाओं की अंतर्निहित शक्तियों को बाहर निकालने का कार्य कर रही है और 650 जिलों तक नेटवर्किंग का कार्य हो रहा है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देकर कहा कि भारत की महिलाओं  का उद्धार करने का की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह स्वयं सिद्धा हैं, वे अपने जीवन के लक्ष्य को जानती हैं। वह अपना उद्धार स्वयं कर सकती हैं। आज की महिलाओं में अपनी शक्तियों का विस्मरण हो गया है लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि महिलाएं अपनी संस्कृति, अपनी शक्तियों को फिर से स्मरण करें और समाज को एक नई दिशा दें। उन्होंने कहा कि माननीय लक्ष्मीबाई केलकर जी ने अपने वैधव्य को अभिशाप न मानकर शक्ति माना और राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुट गई तथा वर्धा में समिति की स्थापना की। हम अपनी कमियों को अपनी शक्ति बनाएं और जिस प्रकार भी संभव हो राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें। यही लक्ष्मी बाई केलकर के जीवन का आदर्श वाक्य था। उन्होंने कहा कि समाज में नेतृत्व करने वाला व्यक्ति मौसी जी जैसा अनुकरणीय होना चाहिए। उनके जीवन और वाणी में मैं का स्थान नहीं था सब कुछ राष्ट्र को समर्पित था। उन्होंने बताया कि मातृशक्ति संगठन द्वारा ही राष्ट्र और विश्व में परिवर्तन संभव है तथा मौसी जी ने मातृशक्ति को परिवार, समाज और राष्ट्र को जोड़ने वाली कड़ी कहा है। संस्कृति का रक्षण, भाषा, आचरण और व्यवहार द्वारा ही संभव है।

उन्होंने रामायण के महत्व को समझा और इसीलिए जगह स्थान स्थान पर जाकर रामायण के व्याख्यान दिए। सीता के जीवन से ही राम राम बने इसलिए महिलाओं को अपने समक्ष सीता का आदर्श रखना चाहिए। उन्होंने महिलाओं के जागरण के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया । देश की सुरक्षा का दायित्व भारत की माताओं को हैं। दीदी मां साध्वी ऋतंभरा जी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। दीदी के बोलने से पूरा ऑडिटोरियम भक्तिमय हो गया। स्त्री स्वयं सिद्धा है अपने कर्तव्यों का बोध होने पर वह विश्व को दिशा दिखा सकती है। उन्होंने कहा कि मौसी जी ने एक ऐसे संगठन की स्थापना की जो कार्यकर्ताओं  को तराशने का काम करता है। उन्होंने एक ऐसा वट वृक्ष लगाया जिसने अन्य कई वट वृक्षों को जन्म दिया। इस संकल्प दिवस पर उन्होंने महिलाओं को संगठित होकर राष्ट्र को संगठित करने का संकल्प लेने का आहृवान किया।



मुख्य अतिथि माननीय कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि वंदनीय लक्ष्मी बाई जी का संपूर्ण जीवन अनुकरणीय रहा है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि जो परिवर्तन है वह अपनी सुरक्षा के लिए है, वह हमारा मूल नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की महिलाएं वैदिक काल से ही जागरूक व शिक्षित  थीं। वैदिक काल मैं 26 महिलाओं ने वेदों की  ऋचाएं लिखी हैं। अपाला, मैत्री, गार्गी, सूर्या सावित्री, सीता ,सावित्री, दमयंती ,जैन धर्म व बौद्ध धर्म के समय की महिलाएं भी जागरूक व शिक्षित थीं। अगर हम थेरीगाथा ग्रन्थ को देखे तो इसमें 76 महिलाओं के शास्त्र ज्ञान का वर्णन मिलता है। स्त्री पुरुष मे भेद करना गलत है। उल्लेखनीय है कि पाश्चात्य मे महिला ईश्वर नहीं हो सकती। किन्तु भारत मे शक्ति सद्बुद्धि और समृद्धि महिला है और जब देवता भी हार जाते है तो स्त्री शक्ति रक्षा करती है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि वर्तमान समाज में मां और बहनों का दायित्व और ज्यादा बढ़ जाता है ताकि समाज के भविष्य को वह संस्कार दें पाए, पुरानी व्यवस्थाएं प्रकाश में आ रही हैं। मौलिक दर्शन को परिवार की महिलाएं ही संभाल कर रख सकती हैं और परिवारों में आदर्श की स्थापना हो। 

आज अगर समाज में भी मातृशक्ति की गूंज है तो उसमें भी कहीं ना कहीं लक्ष्मीबाई केलकर के विचार को ही प्रधानता मिली है कि उन्होंने 1936 में जिस मातृशक्ति के विषय में सोचा था आज समाज में उस मातृशक्ति की उपस्थिति प्रत्येक भारतीय के मन में प्रेरणा का संचार करती है। महिला शक्ति अगर कुछ मन में ठान ले तो कुछ भी असंभव नहीं है। 25 अक्टूबर 1936 विजयदशमी के दिन उन्होंने महिलाओं के एक ऐसे संगठन की नींव रखी जो व्यक्ति निर्माण के साथ समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी योगदान दे। इस  कार्यक्रम में लगभग 600 बहनों ने भागीदारी की। अन्य उपस्थित गणमान्यजनों में विजया शर्मा (राष्ट्र सेविका समिति, अखिल भारतीय तरुणी प्रमुख व प्रांत प्रचारिका दिल्ली प्रांत) सुनीता भाटिया प्रांत कार्यवाहिका, दिल्ली प्रांत, विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर बलराम पाणि डीन ऑफ कॉलेजेस, दिल्ली विश्वविद्यालय, मुख्य अतिथि श्री प्रकाश सिंह निदेशक दक्षिणी परिसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, माननीय सुनीता हल्देकर जी अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका, अंजू आहूजा जी अध्यक्षा शरण्या, सुरेंद्रा जी, राधा मेहता जी उत्तर क्षेत्र कार्यवाहिका, आशा दीदी अखिल भारतीय मार्गदर्शन मंडल व पालक अधिकारी रहीं। 



राष्ट्र सेविका समिति भारतीय महिलाओं का संगठन

राष्ट्र सेविका समिति भारतीय महिलाओं का सबसे बड़ा और सुदृढ़ संगठन है जिसकी शाखाएं पूरे भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फैली हुई हैं। भारत के 2380 शहरों ,कस्बों और गांवों में समिति की 3000 शाखाएं चल रही हैं। समिति के 400 सेवा प्रकल्प चल रहे हैं। दुनिया के16 देशों में समिति की सशक्त उपस्थिति दर्ज हो चुकी हैं। सेविका समिति सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक धरातल पर 1936 से काम कर रही है। शाखाओं के माध्यम से समिति की सेविकाएं (सदस्या) समाज और देश के समग्र विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। 



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