अर्जुन की छाल से दूर हो गई दिल की धमनी की रूकावट
Editor : Rishi
 18 Feb 2017 |  144

नई दिल्ली: दिल की धमनियों की रूकावट को दूर करने के लिए एंजियोप्लास्टी ही एक मात्र विकल्प नहीं है, चिकित्सकों ने अब इसके लिए देशी पद्धतियों के जरिए भी सफल प्रयोग किया है, जर्नल ऑफ एथनोफारमाकोलॉजी के फरवरी महीने के अंक में छपे शोध पत्र के अनुसार अर्जन की छाल और कलौंजी के तेल के नियमित प्रयोग से दिल की धमनी की तीन से चालीस प्रतिशत की रूकावट को दूर किया जा सकता है।

अध्ययन के अनुसार औषधिए वृक्ष टर्मिनालिया अर्जुन या टीए में एंटी इंफ्लेमेटरी तत्व देखे गए हैं, जिसे दिल के मरीजों के लिए एथिनोमेडिसन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। पहले चरण में चूहों पर किए गए अध्ययन में देखा गया कि टीए में मौजूद तत्व से धमनियों के संकुचन को दूर किया जा सकता है। अध्ययन के दौरान चूहों को 14 दिन तक अर्जुन की छाल की दस ग्राम की मात्रा मुंह के जरिए दी गई, टीए के इस्तेमाल के दौरान चूहों के आरएनए और प्रोटीन पर भी नियंत्रण रखा गया। चूहों को दो समूहों में रखा गया, जिसमें एक समूह के चूहों में टीए के साथ को दिया गया, जबकि दूसरा समूह साधारण दवाएं दी गई। टीए या अर्जुन की छाल का प्रयोग करने वाले चूहों के दिल की धमनियां उन चूहों की अपेक्षाकृत अधिक बेहतर देखी गई जिनको टीए नहीं दिया गया। अध्ययन के बावत राष्ट्रपति के वरिष्ठ चिकित्सक, हाइपरटेंशन और कार्डियोवॉस्कुलर विशेषज्ञ डा. मोहसीन एस वली ने बताया कि अर्जुन की छाल के असर की वजह से चूहों के खून में फीटल जीन जैसे बी मायोसीन और ए एक्टीन, ब्रेन नैट्रीयूरेट्रिक तत्व अधिक बेहतर देखे गए। अर्जुन की छाल ने स्ट्रेस मार्कर जीआरपी 78 को भी नियंत्रित रखा।

चार महीने में ठीक हुई दिक्कत:
चूहों पर अर्जुन की छाल के प्रयोग के बाद अब मानव प्रयोग भी शुरू किया गया है, नरेला निवासी 56 वर्षीय श्याम लाल को कार्डियक अर्रेस्ट हुआ, एंजियोग्राफी जांच में पता चला कि दिल की दो धमनियों में 60 प्रतिशत रूकावट है। जिसके लिए एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। स्टेंटिग की जगह श्याम लाल को अर्जुन की छाल और कलौंजी के तेल का 45 दिन तक नियमित सेवन करने के लिए कहा, 50 दिन बाद दोबारा जांच की गई तो धमनियों की 30 प्रतिशत रूकावट दूर हो गई।

नई सेल्स बनने से हुआ फायदा:
डॉ. मोहसीन एस वली ने बताया कि कलौंजी के तेल और अर्जुन की छाल के प्रयोग से दिल में एंजियोजेनेसिस की प्रक्रिया तेजी से हुई, इसमें नियोवास्कुलराइजेशन के नई रक्तवाहिनी नली का तेजी से निर्माण हुआ और धमिनयों में खून का प्रवाह सामान्य हो गया। नई सेल्स की कुछ इस तरह के बनने की प्रक्रिया को ट्यूमर के बनने में भी कारगर माना गया है।


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