12 से 18 महीने के बीच नवजात के व्यवहार में पहचाने ऑटिज्म के लक्षण

Autism Awareness Month is celebrated worldwide during April. The United Nations theme for the year 2026 is— 'Autism and humanity: Every life matters.'
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  • एम्स में अप्रैल महीने में मनाया गया ऑटिज्म जागरूकता माह
  • संवाद संबंधी दिक्कतों का सामना करते हैं बच्चे, सामाजिक सहयोग इस बीमारी में अहम योगदान,

नई दिल्ली, सेहत संवाददाता

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर (एएसडी) बच्चों की एक व्यवहार संबंधी दिक्कत है, जिसे जन्म लेने के बाद से लेकर ढाई साल की उम्र तक पहचाना जा सकता है। अमूमन चिकित्सकों का मानना होता है कि यदि बच्चा 12 से 18 महीने के बीच बोलना नहीं सीख पाता है तो यह ऑटिज्म का बहुत ही प्रारंभिक लक्षण हो सकता है, जबकि विशेषज्ञ ऑटिज्म की पहचान के लिए कई तरह की व्यवहार और संचार संबंधी दिक्कतों पर नजर रखने की सलाह देते हैं, जिन्हें डॉक्टर के पास पहुंचने से पहले ही जांचा जा सकता है, इस बीमारी में मानवीय पहलू को अहम माना जाता है, क्योंकि यह बच्चे सामान्य बच्चों की तरह ही होते हैं, लेकिन अपनी बात और भावनाओं को सही तरह से व्यक्त नहीं पाते, कई बार विशेष तरह का व्यवहार भी रिपीटेटिव होता है जैसे बहुत अधिक गुस्सा, चुप रहना, अकेले में रहना या फिर दोस्तों के साथ अधिक नहीं घुलना मिलना आदि। अप्रैल महीने को ऑटिज्म जागरूकता सप्ताह के रूप में मनाया गया, एम्स में जाने माने न्यूरोलॉजिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ, स्वयं सेवी संगठन और यूनिसेफ के सदस्यों ने ऑटिज्म पर गहन चर्चा की।

एम्स की चाइल्ड न्यूरोलॉजिस्ट और बाल तंत्रिका विभाग की प्रोफेसर शेफाली गुलाटी ने बताया कि इस बच्चों की सही परवरिश में मानवीय व सामाजिक पहलूओं पर अधिक ध्यान देने की जरूरत होती है, इसके लिए शुरूआत घर से ही होती है, परिवार में यदि किसी एक बच्चे को ऑटिज्म है तो अन्य बच्चों में भी इसकी संभावना बढ़ सकती है। दरअसल जन्म के बाद डेढ से तीन साल के बीच बच्चों में संवाद क्षमता विकसित होती है, जिसमें मस्तिष्क में सेल्स कनेक्ट या न्यूरल वायरिंग का अहम योगदान होता है, किसी कारणों से गर्भ में ही या जन्म के बाद की पारिस्थितकि तंत्र की वजह से इसका विकास सीमित या कम होता है। डॉ शेफाली ने बताया कि एम्स में हम इस बात का भी अध्ययन कर रहे हैं कि क्या प्रदूषण या फिर प्रीजेरविंट या फिर गर्भवती का मेटल्स के साथ अधिक एक्सपोजन इसकी वजह हो सकता है? कई बार रेडिएशन, मोबाइल या लैपैटाप पर अधिक काम, अधिक उम्र में विवाह आदि भी पुरूष के शुक्राणुओं की गुणवत्ता को प्रभावित करते हें, इन्हें एपिजेनेटिक प्रभाव कहा जाता है। प्रत्येक नौ बच्चों में एक बच्चें में यह समस्या होती है, और जिनकी पहचान खुद माता पिता कर सकते हैं, एम्स में एक बुकलेट तैयार की गई है, जिससे के जरिए बच्चों के व्यवहार को पहचान कर ऑटिज्म की पहचान की जा सकती है। आंकड़ों की अगर बात करें तो पहले यह समस्या लड़कियों में कम और लड़कों में अधिक पाई जाती थी, लेकिन एम्स द्वारा वर्ष 2020 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार अब दोनों ही वर्ग में यह समस्या बढ़ रही है।

एम्स चाइल्ड न्यूरोलॉजी विभाग ने आईआईटी दिल्ली, आईआईटी कानपुर और सीडैक के साथ मिलकर ऐसे टूल्स तैयार किए हैं, जिससे इन बच्चों की बौद्धिक क्षमता को पहचाना जा सकता है।

ऑटिज्म से जुड़े कुछ अहम तथ्य

  •  सीडीसी (सेंटर फॉर डिसीस कंट्रोल एंड प्रीवेंशन) के 2025 के अनुसार प्रत्येक 31 में एक व्यक्ति का एएसडी का इलाज किया गया
  • इस बीमारी में कोमोरबिटज यानि इससे जुड़ी बीमारियां जैसे स्लो लर्नर, अटेंशन डिफिसेंएंसी और बच्चों का एग्रेसिव व्यवहार आदि को भी ध्यान में रखकर पहचान की जाती है।
  • ऑटिज्म पीड़ित बच्चों को चिकित्सक के साथ ही भाई बहन या घर के अन्य सदस्यों के सहयोग की आवश्यकता होती है
  • इसके लिए स्कूलों को भी विशेष रूप से सचेत किया जाता है कि वह ऐसी किसी भी समस्या से ग्रसित बच्चों के व्यवहार संबंधी परेशानियों को ध्यान में रखते हुए पढ़ने में सहयोग करें।

एम्स, नई दिल्ली के बाल तंत्रिका विज्ञान प्रभाग द्वारा चल रही पहलों में शामिल हैं:

  • 24×7 टोल-फ्री हेल्पलाइन
  • ईमेल आधारित सहायता सेवाएँ
  • शैक्षिक संसाधनों का प्रसार
  • रोगी-अनुकूल डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म

ये प्रयास एक समावेशी पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं—जिससे शीघ्र निदान एवं हस्तक्षेप, कलंक में कमी, देखभालकर्ताओं को समर्थन, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा, तथा एक ऐसे समाज की स्थापना सुनिश्चित की जा सके जहाँ हर ऑटिज़्म से ग्रसित व्यक्ति का सम्मान हो।

अधिक जानकारी हेतु ईमेल करें: pedsneuroaiims@gmail.com

दूरभाष: 9810386847
ईमेल: sheffaligulati@gmail.com, pedneuroaiimsacad@gmail.com

 

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