प्रत्येक तीन में से दो बच्चे दौड़ने पर हांफ रहे

Only 1 in 3 School Children Can Run Without Running Out of Breath, Reveals Sportz Village's 14th Annual Health Survey
Only 1 in 3 School Children Can Run Without Running Out of Breath, Reveals Sportz Village’s 14th Annual Health Survey
  • तीन में एक बच्चा ही बिना हांफे दौड़ लगाने में सक्षम
  • स्पोर्टस विलेज एडूस्पोटर्स ने जारी की अपनी 14वीं रिपोर्ट

नई दिल्ली, सेहत संवाददाता

कभी स्कूल के मैदान में सरपट दौड़ने वाले बच्चे अब कुछ ही देर दौड़ने पर हांफ रहे हैं, इस बात का खुलासा एक स्वयं सेवी संगठन द्वारा किए गए सर्वेक्षण में हुआ है। संस्था द्वारा 14वीं वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की गई है। 112 शहरों के 333 स्कूलों में पढ़ने वाले एक लाख 41 हजार 840 बच्चों पर आधारित यह रिपोर्ट स्कूली बच्चों की फिटनेस पर गंभीरता से विचार करने पर जोर देती है। रिपोर्ट के अनुसार देश में केवल तीन में से एक बच्चा ही बिना हांफे लगातार दौड़ने में सक्षम है जो चिंता का विषय है।

स्पोर्टस विजेज एडू स्पोटर्स संस्था लंबे समय से स्कूलों के स्पोर्टस गतिविधियों और इससे स्कूली छात्रों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर पर काम कर रही है। अध्ययन में बव्चों के स्वास्थ्य को लेकर बीएमआई, एरोबिक क्षमता, एनैरोबिक क्षमता, ऊपरी शरीर की शक्ति, निचले शरीर की शक्ति कोर एब्डामिनल या पेट के हिस्से की सेहत तथा मांसपेशियों में लचीलेपन सहित कई मापदंडों का आंकलन किया गया।

एरोबिक फिटनेस भी नहीं बेहतर

रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया कि तीन में से दो बच्चों की एरोबिक क्षमता उम्र के हिसाब से अपर्याप्त है, जोकि जीवन के बाद के सालों में बच्चों में हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। वर्ष 2023 में बच्चों की एरोबिक क्षमता 27.5 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 34.4 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई, यानि एरोबिक क्षमता बेहतर होने की गति बेहद कम है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बचपन में एरोबिक फिटनेस की कमी आगे चलकर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोग जैसे गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ाती है।

बीएमआई भी नहीं बेहतर

बच्चों की बीएमआई यानि बॉडी मॉस इंडेक्स की चिंताजनक बनी हुई है। कोविड रिकवरी के बाद भी 40 प्रतिशत बच्चे अभी भी बेहतर बीएमआई श्रेणी से बाहर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में साधारण गतिविधियों के अलावा लंबे समय तक स्वस्थ्य जीवनशैली से ही बीएमआई में सुधार किया जा सकता है। बैठे रहने की आदम, अत्यधिक यानि जरूरत से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन का प्रयोग बाहर खेलने के अवसरों की कमी आदि की वजह से बच्चों मे सेडेटरी लाइफ स्टाइल विकसित हो गया है।

कोविड के बाद बदले हालात

कोविड से पहले तक बच्चों की शारीरिक फिटनेस अधिक बेहतर थी, संस्था के पूर्व के आंकड़ों के अनुसार 2020 में 70.5 प्रतिशत छात्र फिटनेस मानकों को पूरा करते थे, लॉकडाइन में स्कूल बंद होने और ऑन लाइन क्लास की वजह छात्रों में फिटनेस का स्तर 70 प्रतिशत से घटकर 56.2 प्रतिशत रह गया है। जो पिछले 14 सालों में सबसे बड़ी गिरावट है।

शारीरिक गतिविधि का पड़ा बेहतर असर

सर्वे के अनुसार जिन छात्रों ने खुद को दो साल के सघन पीई यानि फिजिकल एजूकेशन के लिए पंजीकृत किया उनकी फिटनेस बेहतर हुई। दो साल में छात्रों की फिटनेस का स्तर 66 प्रतिशत से बढ़कर 82 प्रतिशत हो गया, छात्रों की सेहत में दो साल में 14 प्रतिशत का सुधार देखा गया। हालांकि सर्वे में यह भी देखा गया कि लड़कियां फिटनेस के मामले में लड़कों से आगे हैं। एरोबिक क्षमता के अलावा लड़कियां बीएमआई, मांसपेशियों में लचीलापन, कोर स्ट्रेंथ्, शरीर के ऊपरी हिस्से की क्षमता, शरीर के निचले हिस्से की क्षमता, में लड़कों से बेहतर हैं। वहीं एरोबिक क्षमता में लड़कों की क्षमता 41 प्रतिशत और लड़कियों की क्षमता 27 प्रतिशत देखी गई। जो कि जेंडर वजहों से भी हो सकता है।

सरकारी स्कूल के बच्चे अधिक फिट

निजी स्कूलों के एवज में सरकारी स्कूल के छात्र अधिक फिट देखे गए। जिसकी वजह ये बताई कि निजी स्कूली की अपेक्षा सरकारी स्कूल के बच्चे शारीरिक गतिविधियों में अधिक हिस्सा लेते हैं। फिटनेस के पांच से सात मानकों पर सरकारी स्कूल के बच्चों को अधिक फिट पाया गया। इसमें कम बैठने की आदत, प्ले ग्राउंड में अधिक समय, कम स्क्रीन टाइम और कम वजन को मुख्य वजह पाया गया।

साझा प्रयास की जरूरत: CEO का संदेश

सौमिल मजमुदार, सह-संस्थापक, सीईओ एवं एमडी, स्पोर्ट्ज़ विलेज ने कहा कि “यह रिपोर्ट फिर साबित करती है कि स्वस्थ बचपन संयोग से नहीं, प्रयास से बनते हैं। स्कूल संरचित गतिविधियों का आधार प्रदान कर सकते हैं, लेकिन स्थायी प्रभाव तब आता है जब परिवार और समुदाय भी वही आदतें मजबूत करें। भारत को बच्चों के स्वास्थ्य को बड़े पैमाने पर लगातार ट्रैक करना होगा ताकि हम सामूहिक रूप से सही कदम उठा सकें।

 

 

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