बिगड़ी हुई टीबी यानि एमडीआर टीबी अभी भी है बड़ी समस्या

Under the National Tuberculosis Elimination Program (NTEP), there has been a remarkable expansion of diagnostic and treatment facilities in the past few years.
Under the National Tuberculosis Elimination Program (NTEP), there has been a remarkable expansion of diagnostic and treatment facilities in the past few years.
  • केंद्र सरकार ने विश्व टीबी दिवस पर शुरू किया 100 डेज स्क्रीनिंग कार्यक्रम

नई दिल्ली

राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के तहत पिछले कुछ वर्षों में जांच और उपचार सुविधाओं का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। आधुनिक तकनीकों का उपयोग, निःशुल्क उपचार और बेहतर निगरानी व्यवस्था ने टीबी नियंत्रण को मजबूती दी है। फिर भी केवल मरीजों के स्वयं स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचने पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक कलंक, जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण कई मरीज देर से सामने आते हैं, जिससे संक्रमण का चक्र जारी रहता है। इसके साथ ही ऐसे मरीजों की भी संख्या अधिक है जो बीच में ही दवा छोड़ देते हैं, जिससे बिगड़ी हुइ टीबी या एमडीआर टीबी के आंकड़े भी बढ़े हैं।

इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए 100-दिवसीय सक्रिय टीबी जांच अभियान एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव के रूप में उभरा है। इस पहल के तहत स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय के करीब ले जाया जा रहा है। घर-घर जाकर स्क्रीनिंग, मोबाइल एक्स-रे यूनिट्स और विशेष रूप से चिन्हित उच्च जोखिम समूहों पर ध्यान केंद्रित करने से मरीजों की पहचान में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। मंगलवार को इस कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत की गई।

इस बारे में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्लोसिस एंड रेस्पेरेटरी डिसीस के चेस्ट फिजिशियत डॉ कनिष्क सिन्हा ने बताया कि टीबी का इलाज संभव है, इससे डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन टीबी का इलाज पूरा नहीं करने वाले मरीजों में एमडीआर यानि बिगड़ी हुई टीबी के मामले अधिक देखे जा रहे हैं। संस्थान की हेल्थ एजूकेटर प्रियंका शर्मा ने बताया कि निच्छय साथी योजना के तहत आप टीबी के मरीज को गोद ले सकते हैं, जिससे सरकार दवारा स्वीकृत डायट आपको गोद लिए हुए मरीज को डोनेट करनी होगी है, कई संस्थाएं और डॉक्टरों ने इस पहल के तहत टीबी के मरीजों को गोद ले रखा है। जिसकी मॉनिटरिंग निच्छ्य पोर्टल के जरिए होती हैं। क्योंकि टीबी के मरीजों को सही होने में डायट का अधिक योगदान होता है, जो सीधे रूप से मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी है।

मालूम हो कि मधुमेह, एचआईवी/एड्स से ग्रस्त व्यक्ति, बुजुर्ग तथा घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग टीबी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इन समूहों में सक्रिय जांच से न केवल मरीजों की जल्दी पहचान होती है, बल्कि संक्रमण के फैलाव को भी प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है।

तकनीकी प्रगति ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डिजिटल एक्स-रे और CBNAAT जैसी आधुनिक जांच विधियों ने टीबी की पहचान को तेज और सटीक बनाया है, जिससे समय पर उपचार संभव हो पा रहा है।

*हालांकि, यह आवश्यक है कि ऐसे अभियानों को केवल सीमित अवधि तक चलाने के बजाय नियमित स्वास्थ्य सेवाओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।* जब तक सक्रिय जांच को स्वास्थ्य प्रणाली में स्थायी रूप से शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक अपेक्षित दीर्घकालिक परिणाम प्राप्त करना कठिन होगा। भारत ने वर्ष 2025 तक टीबी उन्मूलन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम केवल उपचार पर नहीं, बल्कि समय पर पहचान पर भी समान रूप से ध्यान दें। विश्व टीबी दिवस के अवसर पर यह संदेश स्पष्ट है — *यदि हमें टीबी को समाप्त करना है, तो हमें छूटे हुए मरीजों को खोजकर उन्हें समय पर उपचार देना होगा। यही इस लड़ाई की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।*

https://youtu.be/1n8WZWs42Go?si=CcX1DtQV-176uK7R

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