बच्चा गोद नहीं लेना, हो तो अपना ही खून हो

Parenting is now a days getting highly IVF Dependent, Parents are not keen to have chid through ADOPTION rather they are opting for IVF Which is much costly as well
Parenting is now a days getting highly IVF Dependent, Parents are not keen to have chid through ADOPTION rather they are opting for IVF Which is much costly as well

– चाइल्ड एडाप्शन के एवज में आईवीएफ अधिक पसंद, निसंतान दंपति बच्चा गोद लेने के लिए नहीं उत्साहित

– कारा के आंकड़ों में वर्ष 2024-25 में 4,029 बच्चों को एडाप्ट किया गया, जिसमें 449 बच्चों को विदेशी दंपतियों ने गोद लिया

नई दिल्ली

घर के सूने आंगन में अगर एक अदद बच्चे की किलकारी गूंजें, कोई नन्हें हाथों से अंगूलिया थामे चले, मां या पापा कहकर पुकारे ऐसी इच्छा कितने ही निसंतान दंपतियों की होती है। दांपत्य जीवन आधार एक बच्चा घर को खूशियों से भर देता है, लेकिन वह बच्चा केवल अपना बायोलॉजिकल ही हो, अगर ऐसा संभव नहीं हो पा रहा तो निसंतान दंपति गोद लेकर भी किसी अनाथ बच्चे के जीवन में खूशियां भर सकते हैं, आईवीएफ सेंटर पर बढ़ने वाली भीड़ और कारा (सेंट्रल एडाप्शन रिर्सोस एजेंसी) द्दारा गोद दिए गए बच्चों में एक बड़ा अंदर देखा गया। जिससे यह पता चलता है कि आज बच्चा गोद लेने की जगह दंपतियों को अपना बायोलॉजिकल बच्चा ही चाहिए, जिससे जुड़े कई पहलू भी हैं। जानकारी जुटाने पर पाया गया कि आईवीएफ सेंटर सटीक आंकड़े सरकार तक नहीं पहुंचाते जबकि हर साल एक दो हजार एआरटी (Assisted reproductive technology ) साइकल हर साल किए जाते हैं।

पीआईबी यानि प्रेस इंफारमेशन द्वारा कारा के माध्यम से गोद दिए गए बच्चों का आंकड़ा बीते तीन से चार हजार के बीच है। सबसे अधिक वर्ष 2024-25 में सबसे अधिक 40,029 बच्चों को कारा के नियमों के अनुसार निसंतान दंपतियों को गोद दिया गया। जबकि वर्ष 2020-21 में यह आंकड़ा 3559 तक सीमित था। जिसमें 417 बच्चों को विदेशी दंपतियों ने गोद लिया। यह तो आपको पता ही होगा कि कारा के गोद देने के नियम भी सख्त हैं, यह संस्था केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत हैं, जो निर्धारित मानकों के आधार पर बच्चों को गोद देने की प्रक्रिया की अनुमति देती है। हालांकि विशेषज्ञों का यह भी मनना है कि अधिकांश निसंतान दंपति कई अन्य तरीकों से बिना कारा के हस्तक्षेप के नवजात बच्चों को गोद लेते हें। अब बात करते हैं आईवीएफ की, मतलब एक व्यवस्था ऐसी है, जिसमें आप किसी अनाथ बच्चे के जीवन में उजियारा करते हैं, जबकि आईवीएफ जैसी संस्था में मां पिता के अंडाणु और शुक्राणुओं को संचेतिक कराकर एम्ब्रायों बनता है, लेकिन संतान सुख इसमें भी वहीं है।

प्रश्न उठता है बायोलॉजिकल संतान के लिए लोगों की भीड़ आईवीएफ की तरफ क्यों भाग रही है? कारा में बच्चा गोद लेने के सख्त नियम, वेटिंग लिस्ट लंबी, पारिवारिक दबाव या फिर विश्वास की कमी। गोल मार्केट स्थित दिल्ली आईवीएफ सेंटर के डॉ अनूप गुप्ता कहते हैं कि आईवीएफ पर आने वाले अधिकांश दंपतियों को अपना खुद का बच्चा चाहिए होता है, वह एक दो साइकल यहां तक कि पांच से छह सायकल तक का भी खर्च झेलने के लिए तैयार रहते हैं। मुद्दा यह नहीं कि आईवीएफ को ही क्यों अपनाना चाहते हैं, विचार करने वाली बात यह है कि गोद लेने के लिए वह अपने मन को तैयार क्यों नहीं कर पा रहे? कई बार पारिवारिक परिस्थतियां बच्चा गोद लेने के पक्ष में नहीं होती, फिर माता पिता चाहें तो किसी अनाथ को अपन कर उसके जीवन को रौशन कर सकते हैं। यही वजह है कि विदेशों के एवज में भारत में एडाप्शन या बच्चे गोद लेने की गति बहुत कम है। ग्लोबल डाटा फर्टिलिटि ब्रिज के ताजा आंकड़ों के अनुसार विश्व भर में एक साल में 200 हजार से 250 हजार तक एआरटी सायकल किए जा रहे हैं, अकेले वर्ष 2022 में दो लाख दस हजार एआरटी सायकल किए गए।

आईवीएफ सेंटरों की बढ़ती संख्या, युवाओं में प्रजनन क्षमता का कम होना और बेहतर तकनीकि के बदौलत यह बाजार अगले पांच साल में और अधिक बढ़ेगा। भारत में हालांकि इस प्रक्रिया को पंजीकृत करने के लिए नेशनल एआरटी एंड सरोगेसी रजिस्ट्री की व्यवस्था की गई है, लेकिन सभी क्लीनिक और आईवीएफ सेंटर समय पर सही जानकारी प्रेषित नहीं करते हैं। इसलिए इन सेंटरों की सही जानकारी सरकार तक नहीं पहुंच रही। इसी तरह भारत आकर हर साल कितने विदेशी दंपति संतानसुख लेकर जाते हैं, इसके भी सटीक आंकड़े सरकार नहीं पहुंचाए जाते।

 

प्रजनन क्षमता महिला पुरूष दोनों की ही कम

हैरान करने वाली बात यह है कि आईवीएफ सेंटर पहुंचने वाले दंपति 45 या 50 साल के नहीं, बल्कि 30 से 32 साल उम्र के हैं, विशेषज्ञों का कहना है कि 35 साल से पहले ही यदि महिला या पुरूष में कमी देखी जाएं तो इसका सीधा आश्य है कि दोनों में से किसी एक की लाइफ स्टाइल बेहतर नहीं है, धूम्रपान महिलाओं ही नहीं पुरूषों की भी प्रजनन क्षमता पर उतना ही प्रभाव डालती है। हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कारा ने गोद लेने वाली दंपति और गोद दिए जाने वाली बच्चों की भी उम्र निर्धारित कर रखी है, जिसकी वजह से दंपतियों को सही समय पर बच्चा गोद नहीं मिल पाता। कारा का एक आंकड़ा यह भी कहता है कि पोर्टल पर बच्चों के लिए पंजीकरण कराने वाली 35000 से भी अधिक दंपतियों ने इस बात को स्वीकार किया कि यहां गोद लेने की वेटिंग लिस्ट काफी लंबी है। इस लिहाज से भी आईवीएफ क्लीनिक का कारोबार देश में खूब फलफूल रहा है।

 

 

 

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