
- युवाओं का एक बड़ा वर्ग पॉश्चर से जुड़ी परेशानी का शिकार
- एम्स में पायलट अध्ययन, बैठने की कुर्सी और डेस्कटॉप हो सही
नई दिल्ली
काम की भाग दौड़ के बीच हमें पता ही नहीं चलता कब सीढ़िया चलते हुए घुटने में दर्द शुरू हो जाता है, या फिर किसी एक जगह लंबे समय से बैठे रहने पर उठने में दिक्कत शुरू हो जाती है, जोड़ा में सुबह उठते ही दर्द होता है, जबकि थोड़ा व्यायाम कर लिया जाएं तो हालात सामान्य हो जाते हैं। चालीस की उम्र का आंकड़ा पार कर चुके हर तीसरे युवक की यह परेशानी आम हो गई है। काम करने के तरीके और वर्क स्टेशन के सही न होने की वजह से भी कुछ पॉश्य्चर से जुड़ी परेशानियां हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है। इधर कुछ दिनों से करीब दस अधिक परेशानियां ऐसी सामने आई है जिसका जिम्मेदार मोबाइल और लैपटाप को माना गया है। एम्स के विशेषज्ञों ने भी इस पर चिंता जताई है, कुछ समय पहले एम्स ने सरकार के साथ मिलकर एक प्रोजेक्ट किया। जिसमें मोबाइल से जुड़ी पॉश्चर समस्याओं का जिक्र किया गया है।
एम्स के रिह्यूमेटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ उमा कुमार ने बताया कि चालीस से 45 साल की उम्र में बोन्स डिजरेशन लगभग हर तीसरे युवा में शुरू हो जाता है, जबकि पहले उम्र का यह दायरा 50 से 52 साल माना जाता था, इसमें सबसे अहम योगदान मोबाइल का लंबे समय तक एक ही दशा में प्रयोग और काम करने की गलत पॉश्चर को माना गया है। कामकाजी युवाओं की दक्षता बनाएं रखने के लिए कुछ निजी कंपनियां अब वर्क स्टेशन पर बहुत काम कर रही हैं, जिसमें एरगॉनामिक्स की मदद से विशेष वर्किंग टेबल और कुर्सी डिजाइन की जा रही है। डॉ उमा ने बताया कि मोबाइल पर बात करने की वजह से दस से 12 तरह की प्रमुख समस्याएं देखी गई हैं। जिसमें कारपल टनल सिंड्रोम, टेनिस एल्बो, बरसिटिस, डी क्वेरविन, हरनिटेड डिस्क, नेक स्ट्रेन, टेंडिनिटिस, फ्रोजेन सोल्डर, एपिकोंडलाइटिस आदि शामिल हैं, डॉ उमा ने बताया कि यह ऐसी समस्याएं हैं जो ऐसे युवाओं में भी देखी जा रही है जो नियमित रूप से व्यायाम करते हैं, समस्या की गंभीरता से बचने के लिए जरूरी है कि एक उम्र के बाद लंबे समय एक ही पॉश्चर में बैठने और अधिक एक्सरसाइज करने पर नियंत्रण रखना चाहिए। बोन डिजनरेशन में कई तरह के कारक मिलकर ज्वाइंटस को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए यदि आप लंबे समय तक बैठने या खड़े रहने के काम में हैं तो प्रत्येक 20 मिनट में अपना पॉश्चर बदलते रहें, यही नियम लैबटॉप या डेस्क टॉप पर लंबे समय तक काम करने पर भी लागू होता है। एम्स के ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट डॉ राजेश कुमार ने बताया कि काम करने के तरीके आप मांसपेशियों और ज्वाइंट्स को काफी हद तक प्रभावित करते हैं, आम दिनचर्या में ऐसे प्रभावों को कुछ मामलू व्यायाम से बेहतर किया जा सकता है। युवाओं को खास तौर पर वर्क स्टेशन और मोबाइल पर बात करने के समय पर नजर रखनी चाहिए, यदि आप भी मोबाइल यूज के रेड जोन में आते हैं तो ऐसे व्यायाम रोजाना करें, जिससे अंगुलियों, गर्दन, कंधे और पैरों के मांसपेशियों पर होने वाले दवाब को कम किया जा सके। राजेश कुमार ने बताया कि मोबाइल पर लंबे समय तक झुके रह कर टाइपिंग करने से सांस से जुड़ी तकलीफ भी होती है, इसलिए स्ट्रेचिंग में ऐसे व्यायाम शामिल करें जिससे छाती से की रिब्स की जकड़न भी दूर हो।
प्रोटीन के सप्लीमेंट नहीं बेहतर
डॉ उमा कुमार ने बताया लोगों में प्रोटीन और यूरीक एसिड को लेकर इधर कुछ दिनों से काफी भ्रम हैं, थोड़ा भी यूरिस एसिड बढ़ने पर लोग तुरंत प्रोटीन कम लेना शुरू कर देते हैं, जबकि यदि सही तरीके से मापा जाएं तो एक साधाारण व्यस्क दिनभर के खाने में शरीर की जरूरी और रिकमेंडेड डायटरी एलाउंस के अनुसार प्रोटीन लेना ही नहीं हैं, ऐसे में प्रोटीन कम करने से उल्टा नुकसान अधिक होता है। इसी तरह जिन्हें कम प्रोटीन होता है वह तुरंत प्रोटीन पाउडर लेना शुरू कर देते हैं, जबकि प्राकृतिक स्त्रोत में हमारे पास प्रोटीन के बेहतर विकल्प उपलब्ध हैं, जिसमें टोफू यानि सोयाबीन का पनीर, आदि लिया जा सकता है। यूरीक एसिड बढ़ने पर डॉक्टर सुक्रोज या कृत्रिम शर्करा लेने से मनाह करते हैं, दाल और राजमा प्रोटीन के बेहतर विकल्प कहे जा सकते हैं।

Senior Reporter