
लखनऊ
16 अगस्त के दिन जब पूरा देश श्री कृष्ण जन्मोत्सव के रंग में डूबा था, लखनऊ में तीन साल के मासूम के ऊपर खेलते खेलते 20 फीट एक लोहे की नुकीली ग्रिल गिर गई। जो बच्चे के सिर को पार करती हुई निकल गई। इस पूरे वाकए को सुनने में लगेगा कि ऐसी अवस्था में भगवान ही उसे बचा सकते हैं, विपरित स्थिति में एक डॉक्टर कार्तिक के लिए भगवान बनकर आए।
उसी दिन सर्जरी करने वाले डॉक्टर की मां को दिल का दौरा पड़ा था, कर्म और भावनाओं को समटते हुए केजीएमसी में यह सफल सर्जरी मात्र 25 हजार के खर्च पर हुई, जिसका निजी अस्पताल में 15 लाख रुपए का खर्च बताया गया था।
इससे पहले एक वेल्डिंग मशीन वाले ने पहले लोहे की ग्रिल को बच्चे के सिर से अलग किया, आनन फानन में माता पिता बच्चे को लेकर एक प्राइवेट अस्पताल में पहुंचे, जहां इलाज का खर्च 15 लाख रूपए बताया गया, मासूम के पेरेंट्स के पास इतने पैसे नहीं थे।
आधी रात को निराश परिजन बच्चे को लेकर किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां नन्हे के सिर को चीरती हुई लोहे की छड़ को डॉक्टरों के अथक प्रयास से निकाला गया,
डॉक्टरों ने जब यह देखा, तो कुछ क्षण के लिए वहाँ भी सन्नाटा छा गया। इसी खामोशी के बीच आगे बढ़ते हुए डॉ अंकुर बजाज ने ओटी में प्रवेश किया, सभी के दिल में एक ही प्रश्न था, बच्चे की जिंदगी खतरे में है क्या डॉ दीपक आंधी में कांप रहे उसे दिये समान कार्तिक को बुझने से बचा पाएंगे?
लेकिन डॉक्टर अंकुर के लिए भी यह उतना आसान नहीं था, डॉक्टर अंकुर कुछ समय पहले ही जिंदगी के बेहद कठिन समय को देखकर वापस आए थे, दरअसल उसी अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग में उनकी मां का इलाज चल रहा था, मां को दिल का दौरा पड़ा था, तीन स्टेंट पड़ चुके थे और हालत नाजुक बताई गई थी, एक तरह चिंता की मां की सांसों की, दूसरी तरफ कार्तिक को जीवन दान देने की, अजीब कश्मोकश के दौर से गुजरते हुए डॉक्टर ने दृढ़ता के साथ अपने पेशे को चुना,
वह आधी रात को ट्रामा सेंटर पहुंचे, छह घंटे से भी ज्यादा देर चली जटिल सर्जरी का हर पल चुनौतीपूर्ण था,
और आखिरकार डॉक्टर लोहे की छड़ को बच्चे के शरीर से निकालने में सफल रहे
डॉ. अंकुर बजाज और उनकी टीम ने यह साबित कर दिया कि डॉक्टर सिर्फ शरीर नहीं जोड़ते, वे टूटते हुए रिश्तों को, डगमगाते हुए भविष्य को, और डूबते हुए भरोसे को भी बचा लेते हैं। अन्य सहयोगी टीम में डॉ. बीके ओझा, डॉ. अंकुर बजाज, डॉ. सौरभ रैना, डॉ. जेसन और डॉ. बसु के अलावा एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. कुशवाहा, डॉ. मयंक सचान और डॉ. अनीता ने असभंव को संभव कर दिखाया, वह भी 25 हजार के खर्चे पर।


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