
- समय पर जांच और इलाज से बचाई जा सकती है जान, डॉक्टरों ने दी चेतावनी
- हर 4 मिनट में एक व्यक्ति की मृत्यु स्ट्रोक से होती है।
- 15 से 49 साल के लोगों में स्ट्रोक के मामले बढ़े
नई दिल्ली,
नींद में आने वाले खर्राटे मौत की दस्तक भी हो सकती है। स्लीप एपनिया (नींद में सांस रुकने की समस्या) स्ट्रोक के जोखिम को दो से चार गुना तक बढ़ा देती है, लेकिन बहुत से लोग इसे सामान्य खर्राटे समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
यह कहना है यथार्थ हॉस्पिटल, मॉडल टाउन के न्यूरोलॉजी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट एवं एचओडी, डॉ. रजत चोपड़ा का,उन्होंने कहा कि नींद में आने वाले खर्राटे को अक्सर हम लोग सामान्य मान लेते हैं जबकि यह सामान्य नहीं है। उन्होंने बताया कि ख़ास तौर पर स्लीप एपनिया (नींद में सांस रुकने की समस्या) स्ट्रोक के जोखिम को चार गुना तक बढ़ा देती है। लगभग 50-60% स्ट्रोक के मरीजों को स्लीप एपनिया होता है। हर साल भारत में लगभग 17.5 से 18.5 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आते हैं और हर 4 मिनट में एक व्यक्ति की मृत्यु स्ट्रोक से होती है।
वह वर्ल्ड स्ट्रोक डे (29 अक्टूबर) के अवसर पर यथार्थ हॉस्पिटल, मॉडल टाउन में स्ट्रोक के बढ़ते मामलों और उनके छिपे कारणों पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित हुई। डॉ सुनील कुमार बरनवाल, डायरेक्टर & हेड डिपार्टमेंट ऑफ़ न्यूरोसर्जरी & सुनील सत्य कपूर चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर यथार्थ हॉस्पिटल मॉडल टाउन भी इस कांफ्रेंस में उपस्थित थे .
इस अवसर पर न्यूरोलॉजी विभाग के सीनियर कंसल्टेंट एवं एचओडी, डॉ. रजत चोपड़ा ने कहा कि आज स्ट्रोक सिर्फ उम्रदराज लोगों की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि युवाओं में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया 1990 से 2021 के बीच किए गए आंकड़ों के अनुसार, स्ट्रोक के मामले प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 90 से 145 मामलों के बीच रही।स्ट्रोक से अपंगता (disability) के साथ जी रहे लोगों की संख्या 1990 में 44 लाख से बढ़कर 2021 में 94 लाख हो गई है।
डॉ. चोपड़ा ने कहा, “स्लीप एपनिया के कारण ब्लड प्रेशर बढ़ता है, दिल की धड़कनें असामान्य होती हैं और शरीर में सूजन की समस्या बढ़ जाती है। ये सभी बातें मिलकर दिमाग की ख़ून की नलियों पर दबाव डालती हैं, जिससे स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। अगर लोग समय रहते इसकी जांच कराएं और इलाज शुरू करें, तो स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थिति से बचाव संभव है।”
उन्होंने बताया कि यथार्थ अस्पताल में ऐसे कई मरीज देखे गए हैं, जिनमें स्ट्रोक के पीछे स्लीप एपनिया प्रमुख कारण के रूप में सामने आया। लोगों को यह समझना होगा कि खर्राटे सिर्फ आवाज नहीं हैं, बल्कि शरीर की एक चेतावनी है। पिछले कुछ वर्षों में स्ट्रोक के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हम प्रत्येक माह लगभग 50 से 55 स्ट्रोक से जुड़े पेशंट्स देखते हैं। इसका अब युवाओं अधिक असर देखने को मिल रहा है। साथ ही 15-49 आयु वर्ग में यह काफी तेजी से बढ़ रहा है।
इतना ही नहीं हाल ही में हमने 5 साल के बच्चे का एक्यूट स्ट्रोक की स्थिति में इलाज किया। यह बच्चा कुछ हफ्ते के बाद रिकवर हो पाया था। इसका कारण बढ़ता हुआ होमोकाइस्टीन लेवल था। उन्होंने बताया जन्म से 18 वर्ष की उम्र तक स्ट्रोक की दर 11-12 मामले प्रति 1 लाख जनसंख्या है,लगभग हर 7 में से 1 स्ट्रोक 15 से 49 वर्ष की आयु में होता है,और 10-15% स्ट्रोक 18 से 50 वर्ष की आयु वर्ग में देखे जाते हैं।
पिछले कुछ सालों में महिलाओं में भी स्ट्रोक के मामलों में वृद्धि देखी गई है, डॉ. रजत बताते है कि आंकड़ों के मुताबिक 2019 में महिलाओं में स्ट्रोक की दर लगभग 56% रही।लगभग हर 5 में से 1 महिला को अपने जीवनकाल में स्ट्रोक होता है। 25 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में जीवन काल स्ट्रोक का जोखिम 25.1% पाया गया। 25-44 वर्ष की उम्र में महिलाओं में पुरुषों की तुलना में स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है, 45-64 वर्ष की आयु वर्ग में हर 5 में से 1 महिला को स्ट्रोक का खतरा रहता है।
महिलाओं में मीनोपॉज के बाद स्ट्रोक का खतरा
64 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में स्ट्रोक का जोखिम अधिक होता है क्योंकि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं। महिलाओं में स्ट्रोक का खतरा कई बार छिपे हुए कारणों से जुड़ा होता है। मेनोपॉज़ के बाद हार्मोनल बदलाव, गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएँ, गर्भनिरोधक गोलियों का उपयोग, माइग्रेन (ऑरा के साथ) और ऑटोइम्यून डिसऑर्डर उनके स्ट्रोक के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। अक्सर माइग्रेन, डिप्रेशन या बहुत ज़्यादा चिंता जैसे लक्षणों को सामान्य मानसिक स्थिति मानकर अनदेखा कर दिया जाता है, जबकि ये स्ट्रोक के शुरुआती संकेत भी हो सकते हैं। इसलिए महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे अपने शरीर में होने वाले इन बदलावों को गंभीरता से लें और नियमित रूप से डॉक्टर की सलाह से इस खतरे को समय रहते नियंत्रित करें।
स्ट्रोक की पहचान के ‘एफ़एएसटी संकेतों को समझें, चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ या पैर में कमजोरी, बोलने में परेशानी जैसे ही ये लक्षण किसी व्यक्ति में अगर दिखने पर उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाएं। शुरुआती 4.5 घंटे के भीतर इलाज मिलने पर मरीज की जान बचाई जा सकती है और स्थायी नुकसान से बचाव संभव है।
बचाव के तरीके
- जीवनशैली में बदलाव, जैसे स्वस्थ भोजन, नियमित व्यायाम, धूम्रपान और शराब से परहेज करना
- नियमित चिकित्सा जांच करवाना बहुत महत्वपूर्ण है।
- उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना स्ट्रोक के जोखिम को कम करने के लिए आवश्यक है।
- जीवनशैली में बदलाव करें,संतुलित, कम नमक और कम संतृप्त वसा वाला आहार लें।
- फल, सब्जियां और साबुत अनाज खाएं।नियमित व्यायाम करें, हर हफ्ते कम से कम ढाई घंटे) मध्यम-तीव्रता वाला व्यायाम करें, जैसे तेज चलना या तैराकी।
- यदि आप धूम्रपान या शराब का सेवन करते हैं, तो तुरंत छोड। वजन को नियंत्रित रखें।
- तनाव को कम करने के लिए पर्याप्त नींद लें और योग या ध्यान जैसी तकनीकों का सहारा लें।
- वयस्कों के लिए प्रति रात (7-9\) घंटे की नींद बहुत ज़रूरी है।
- स्वास्थ्य की निगरानी रक्तचाप और शुगर की नियमित जांच कराएं, उच्च रक्तचाप स्ट्रोक का एक प्रमुख कारण है।

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