“लिविंग विल’ ताकि आप चैन से ले पाएं जिंदगी की आखिरी सांस

Just as people prepare a will for their property while they are still alive, in the same way, people can now also make a will for their end-of-life wishes, and many have already started doing so.
Just as people prepare a will for their property while they are still alive, in the same way, people can now also make a will for their end-of-life wishes, and many have already started doing so.

क्या हैं Advance Medical Directives?

नई दिल्ली, परिमल कुमार

मौत, इंसान के जीवन की एक कड़वी सच्चाई है, लेकिन इसके बारे में बात करना लोग पसंद नहीं करते। जीते-जी भला कोई मरने की बात क्यों करेगा? लेकिन आज के समय में इस पर चर्चा होने लगी है। जिस प्रकार लोग अपनी संपत्ति की वसीयत अपने जीते-जी तैयार करवा लेते हैं, उसी प्रकार अब लोग अपने अंतिम समय की इच्छाओं की वसीयत भी बनवा सकते हैं, और कई लोगों ने ऐसा करना भी शुरू कर दिया है।

इसी मुद्दे पर Kiddocracy के संस्थापक परिमल कुमार ने इंडियन एसोसिएशन ऑफ पेलिएटिव केयर की अध्यक्ष और AIIMS की IRCH विंग की प्रमुख, डॉ. सुषमा भटनागर, और मुंबई के हिंदुजा अस्पताल के न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. रूप कुमार सहानी से विशेष बातचीत की।

क्या हैं Advance Medical Directives?

डॉ. सुषमा भटनागर कहती हैं कि यह एक ऐसी वसीयत है, जिससे जिंदगी के अंतिम समय का नियंत्रण भी हमारे हाथ में रहता है। जिस तरह हमारे करियर, परिवार और अन्य निर्णयों का नियंत्रण हमारे पास होता है, उसी तरह हमारे अंत का नियंत्रण भी हमारे पास होना चाहिए। इसे दूसरों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए कि अगर हम बेहोशी की हालत में अस्पताल पहुंच जाएं, तो डॉक्टर अपनी मर्जी से इलाज करें या परिवार वाले हमें वेंटिलेटर या आईसीयू में डालने का फैसला करें। यह हमारा अधिकार होना चाहिए कि हम अपने अंत को सम्मानजनक बनाएं और उसकी योजना पहले से बनाएं।

डॉ. रूप कुमार सहानी, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताते हैं, “मुझे लगभग 8 साल पहले अरुणा शानबाग केस के दौरान यह एहसास हुआ कि जीवन का अंत एक कड़वी सच्चाई है, जिसे हर किसी को स्वीकार करना पड़ता है। लेकिन उस समय कानून हमें हमारे अंतिम समय का नियंत्रण अपने हाथ में रखने की इजाजत नहीं देते थे। तब मैं सोचता था कि काश एक दिन ऐसा हो, जब हर व्यक्ति को यह अधिकार मिले कि वह अपने अंतिम समय का निर्णय खुद ले सके। आज यह संभव है। अब आप अपनी अंतिम समय की इच्छाओं को पहले से तय कर सकते हैं।”

इसके लिए आप विधि लीगल, पैलियम इंडिया, या इंडियन एसोसिएशन ऑफ पेलिएटिव केयर की वेबसाइट से Advance Medical Directives का फॉर्म डाउनलोड कर सकते हैं। इस फॉर्म को भरकर आप अपनी अंतिम समय की वसीयत तैयार कर सकते हैं और अपने जीवन के अंतिम क्षणों का नियंत्रण खुद के हाथ में ले सकते हैं।

डॉ. रूप कुमार सहानी द्वारा साझा किए गए 3 उदाहरण:

डॉ. सहानी ने Advance Medical Directives का उपयोग कर अपने जीवन के अंतिम समय का नियंत्रण अपने हाथ में लेने वाले तीन मरीजों के उदाहरण साझा किए। ये उदाहरण यह दिखाते हैं कि कैसे लोग अब अपने जीवन की अंतिम यात्रा को गरिमा और शांति के साथ तय करना चाहते हैं।

  1. 32 वर्षीय महिला का मामला:

डॉ. सहानी ने अपनी एक मित्र का उदाहरण दिया, जो अभी 32 साल की हैं। उन्होंने अपनी वसीयत में यह लिखा है कि यदि कभी ऐसी स्थिति आए, जिसमें उनके जीवित रहने की संभावना अच्छी न हो, या उनके मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंच जाए, तो उनके अंगों को दान कर दिया जाए। यह निर्णय उन्होंने अपने जीवन के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए लिया है।

  1. दिल का दौरा पड़ चुके मरीज का मामला:

एक अन्य मरीज, जिनकी बहन को गंभीर ब्रेन हैमरेज हुआ था और उन्होंने उसकी पीड़ा को करीब से देखा था। खुद इस मरीज को भी पहले दिल का दौरा पड़ चुका है। उन्होंने अपनी वसीयत में यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर कभी ऐसी स्थिति आए, जिसमें उन्हें वेंटिलेटर पर रखा जाए, तो उन्हें कृत्रिम सहायता पर न रखा जाए और स्वाभाविक मृत्यु का सम्मान किया जाए।

  1. 82 वर्षीय बुजुर्ग का मामला:

डॉ. सहानी ने 82 वर्षीय एक मरीज का उदाहरण दिया, जिन्हें क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव लंग डिजीज थी और ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहना पड़ता था। पल्मोनोलॉजिस्ट ने उन्हें छह महीने से एक साल तक जीने की संभावना जताई थी। उनकी पौती की शादी एक साल बाद थी, जिसे वह देखना चाहते थे। अपनी वसीयत में उन्होंने निर्देश दिया कि यदि उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़े, तो पांच दिनों तक ही रखा जाए। यदि वह सुधार न करें, तो उन्हें जीवनरक्षक उपकरणों से हटा दिया जाए। साथ ही, अगर उनका हृदय रुक जाए, तो उन्हें पुनर्जीवित करने की कोशिश न की जाए। उन्होंने अपनी पौती की शादी देखी और फिर सम्मानजनक रूप से इस दुनिया को अलविदा कहा।

Death Literacy:

डॉ. सुषमा भटनागर के अनुसार, Death Literacy का अर्थ है कि हम लोगों को मृत्यु और जीवन के अंतिम समय के बारे में जागरूक करें। यह समझना और दूसरों को समझाना कि सम्मानजनक और गरिमामय अंत का अधिकार सबके पास होना चाहिए।

डॉ. रूप कुमार सहानी इस पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहते हैं, “यह डॉक्टरों की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि जब कोई बीमारी इलाज के दायरे से बाहर हो जाती है, तो वे इसे मरीज और उसके परिवार को स्पष्ट रूप से बताएं। यह भी समझाएं कि इलाज (क्योर) अब संभव नहीं है, लेकिन देखभाल (केयर) जारी रहेगी।”

वह यह भी जोड़ते हैं कि अक्सर डॉक्टरों को इस तरह की स्थिति के बारे में संवाद करने की पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दी जाती। कई बार डॉक्टर सीधे कह देते हैं, “अब मैं कुछ नहीं कर सकता,” जो मरीज और उसके परिवार के लिए बेहद कठिन और असंवेदनशील हो सकता है। इसके बजाय, डॉक्टरों को यह सिखाया जाना चाहिए कि इस संवेदनशील स्थिति में मरीज और परिवार के साथ कैसे संवाद करें और उन्हें सहारा दें।

वेंटिलेटर पर जाने का मतलब ये नहीं की मौत ही हो जाए

परिमल जी के सवाल पर जवाब देते हुए, डॉ. रूप कुमार सहानी हिंदुजा अस्पताल का उदाहरण साझा करते हैं। वे बताते हैं, “हम आमतौर पर एक ICU ट्रायल रखते हैं, जो 3 से 5 दिन तक चलता है। यह अवधि अधिकतर 7 दिन से आगे नहीं बढ़ाई जाती। यदि 5 दिनों में भी मरीज की स्थिति में कोई सुधार नहीं होता, तो हम परिवार के सदस्यों के साथ इस बारे में चर्चा करते हैं।”

अपनी बात को समाप्त करते हुए डॉ. सहानी कहते हैं, “मृत्यु हर इंसान की नियति है, लेकिन यदि अपनी मौत को गरिमा और नियंत्रण के साथ अपनाना चाहते हैं, तो यह दस्तावेज़ या वसीयत बनवाना बेहद जरूरी है।”

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