
फरीदाबाद,
47-वर्षीय इस मरीज के बाएं घुटने के नजदीक स्थित एक बड़े आकार के ट्यूमर से जब उनकी चलने-फिरने की क्षमता के लिए खतरा पैदा हो गया, तो उनके सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। लेकिन डॉक्टरों की टीम ने न सिर्फ मरीज की सफल सर्जरी की, बल्कि उसे फिर से अपने पैरों चलने फिरने लायक भी बना दिया। मरीज के पैर में कस्टम कृत्रिम प्रत्यारोपण (इंप्लांट) ने न सिर्फ उनका ट्यूमर हटाकर अलग किया बल्कि एक ऐसे मरीज को उम्मीद, आजादी और मोबिलिटी का उपहार भी दिया जिनकी जिंदगी अधर में लटकी थी।
मरीज गिरने के बाद अपने घुटने के दर्द से परेशान होने पर रूटीन जांच के लिए ऑर्थोपिडिक्स ओपीडी आए थे, और यहीं से पूरे हालात ही बदल गए। आरंभिक एक्स-रे जांच से पता चला कि उनके घुटने के जोड़ के ऊपरी सिरे के नजदीक फ्रैक्चर था, लेकिन फौलो-अप एमआरआई से अधिक गंभीर समस्या का खुलासा हुआः उनके घुटने के ठीक नीचे 15 से.मी. आकार का एक बोन ट्यूमर, जिसका वज़न लगभग 200 ग्राम था, उनकी पिंडली की हड्डी को बुरी तरह से दबा रहा था। यह नाजुक स्थान होता है जहां सॉफ्ट-टिश्यू कवरेज न्यूनतम होता है लेकिन मोबिलिटी की दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण भी होता है।
ट्यूमर के बढ़ने और हड्डी के लगातार घिसने का खतरा साफ दिखायी दे रहा था, और ऐसे में मरीज को बचाने के लिए पैर काटना एकमात्र विकल्प दिखायी दे रहा था। लेकिन, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पीटल फरीदाबाद में डॉ आशुतोष श्रीवास्तव और उनकी टीम ने एक अलग ही विकल्प को चुनाः उन्होंने प्रभावित हड्डी की जगह प्रॉक्सीमल टिबियल मेगाप्रोस्थेसिस – जो कि बड़े आकार का कृत्रिम इंप्लांट होता है, लगाने का फैसला किया और इस प्रकार इस जटिल सर्जरी से मरीज का पैर तथा उनके घुटनों की कार्य प्रणाली को भी बचाने में सफलता हासिल की।
इस फैसले से उक्त मरीज को उसकी क्षमता वापस मिली और वह दोबारा चलने-फिरने में सक्षम बने, जिससे अपनी दैनिक गतिविधियों और मोबिलिटी को उन्होंने वापस पा लिया। इस सर्जरी ने केवल ट्यूमर को ही नहीं हटाया, बल्कि मरीज को उनकी खोयी उम्मीद, उनका सम्मान और और एक ऐसा भविष्य भी लौटाया जो पैर कटने की तकलीफ से पूरी तरह मुक्त था। इस सर्जरी से ट्यूमर को पूरी तरह से निकाल बाहर किया गया, जिसकी वजह से मरीज की हड्डी भी काफी हद तक नष्ट हो गयी थी और इसे सटीकतापूर्वक रीकंस्ट्रक्ट करना जरूरी था। पैर की लंबाई, स्थिरता और घुटनों की मूवमेंट को बहाल करने के लिए, एक बड़े आकार का कृत्रिम प्रत्यारोपण इस्तेमाल किया गया जिसे उनकी पिंडली की हड्डी के ऊपरी भाग में लगाया गया। आसपास के नाजुक ऊतकों (सॉफ्ट टिश्यू) को रोटेशनल मसल फ्लैप की मदद से सावधानीपूर्वक दोबारा निर्मित किया गया ताकि इंप्लांट को सुरक्षित रखा जा सके, और साथ ही, घुटनों की एक्सटेंशन प्रणाली को भी रीकंस्ट्रक्ट किया गया ताकि सही तरीके से मूवमेंट और दीर्घकालिक फंक्शन बहाल किया जा सके। सर्जरी के बाद, समुचित देखभाल, मार्गदर्शन में फिजियोथेरेपी और रेग्युलर फौलो-अप के बाद मरीज में काफी प्रगति दिखायी देने लगी है।
सर्जरी के तीन महीनों के भीतर ही, अब मरीज बिना किसी सहारे के खुद चलने-फिरने में सक्षम हैं, और आसानी से अपनी दैनिक गतिविधियों को भी खुद करने लगे हैं तथा उनके घुटनों की पूरी मूवमेंट भी वापस आ चुकी है। वह बिना किसी तकलीफ या जटिलता के चल-फिर रहे हैं, जो उनकी बेहतरीन रिकवरी को दर्शाता है।
इस मामले का ब्योरा देते हुए, डॉ आशुतोष श्रीवास्तव, डायरेक्टर, ऑर्थोपिडिक्स एंड ज्वाइंट रिप्लेसमेंट, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पीटल फरीदबाद ने कहा, “प्रॉक्सीमल टिबिया के जटिल बोन ट्यूमर कई बार सर्जिकल चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं। हमारा लक्ष्य हमेशा से पैर/हाथ (लिंब) बचाने का रहता है और साथ ही, हम सुनिश्चित करते हैं कि मरीज के लिए उनका आगे का जीवन पीड़ा-रहित हो और वह शारीरिक रूप से भी सक्रिय बने रहें। मरीज की रिकवरी देखकर हमें खुशी मिलती है, और इस मामले ने एक बार फिर एडवांस रीकंस्ट्रक्टिव तकनीकों जैसे मेगाप्रॉस्थेसिस के महत्व पर जोर दिया है।”
डॉ, डायरेक्टर, ऑर्थोपिडिक्स एंड ज्वाइंट रिप्लेसमेंट, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पीटल फरीदबाद ने कहा, “यह मामला कैंसरग्रस्त लिंब को बचाने का शानदार उदाहरण है, जिसके लिए सर्जिकल प्लानिंग में सटीकता, अत्याधुनिक तकनीक से रीकंस्ट्रक्शन, और एक्सपर्ट सॉफ्ट-टिश्यू मैनेजमेंट का सहारा लिया गया। इतने कम समय में, लगभग सामान्य फंक्शन की बहाली ने बेहद जटिल किस्म के ऑर्थोपिडिक ओंकोलॉजी मामलों के प्रबंधन में फोर्टिस एस्कॉर्ट्स फरीदाबाद की क्षमताओं को एक बार फिर रेखांकित किया है।

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