होम्योपैथी के जनक, जिन्होंने यूरोप में बदल दी थी इलाज की परिभाषा

Samuel Christian F. Hahnemann turned his father's teachings into advice. He received training as a physician and chemist, while his father was a painter by profession.
Samuel Christian F. Hahnemann turned his father’s teachings into advice. He received training as a physician and chemist, while his father was a painter by profession.
  • सैम्युल क्रिश्चिन एफ हनीमैन ने पिता की सीख को बनाया नसीहत
  • एक फिजिशियन और कैमिस्ट के तौर पर लिया प्रशिक्षण, पिता पेशे से थे एक पेंटर

नई दिल्ली, निशि भट्ट

17वीं शताब्दी का वह दौर था जबकि चिकित्साजगत में बिना किसी प्रमाणितकता के पहले से निर्धारित मानकों पर लोगों का इलाज किया जा रहा था, एलोपैथी में इलाज करने का यह तरीका आज भी कायम है, लेकिन यूरोप के एक छोटे से शहर मेशियन में जन्म लेने वाले सैम्यूल क्रिश्यिन एफ हनीमैन ने बचपन से ही चीजों को बिना प्रश्न किए स्वीकार कर लेना नहीं सीखा था, और यह सीख उनको उनके पिता से मिली, पिता पेशे से पेंटर थे, लेकिन एक बात बालमन में घर कर गई, पिता ने कहा बेटे तुम चाहे जितने भी बड़े हो जाओ किसी भी आयडिया या विचार को बिना प्रश्न किए स्वीकार मत करना हर विषय पर तुम्हारी स्वतंत्र सोच जरूर होनी चाहिए। यही बात उन्होंने तत्कालीन जारी एलोपैथी विधा पर अपनाई और एक ही झटके में मेडिसिन का क्षेत्र छोड़ दिया, लेकिन मानवता के लिए उन्होंने एक नई विधा की शुरूआत की, जो बाद में यूरोप ही नहीं विश्वभर में प्रसिद्ध हुई, जिसे आज हम होम्योपैथी के नाम से जानते हैं।

बचपन से होशियार हनीमैन की कैमिकल और साइंस में विशेष रूचि थी, फिर चीजों पर प्रश्न करना उनकी आदत में शामिल था। वर्ष 1779 में लेपिज और मेना से उन्होंने मेडिकल की औपचारिक शिक्षा ग्रहण की, बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ एरलार्गन से मेडिसिन में एमडी की डिग्री भी हासिल कर ली, लेकिन असली बदलाव प्रैक्टिस के दौरान शुरू हुआ। चिकित्सा जगत में एक पेशेवर के रूप में उनका प्रवेश काफी कष्टकारी था, वह इलाज की पहले से प्रमाणित पद्धतियों को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे, हर मरीज पर लगभग पहले जैसा ही मानक अपनाकर इलाज शुरू कर दिया जाता था, इसके लिए किसी साक्ष्य को अपनाना जरूरी नहीं समझा जा रहा था कि अमुक दवा या इलाज इस मरीज पर असर करेगा या नहीं? तमाम प्रश्न और जद्दोजहत के बीच उन्होंने मेडिसिन का क्षेत्र छोड़ दिया और ऐसी किसी विधा पर काम करने लगे जिससे लोगों को कम हानि हो और फायदा अधिक हो, हालांकि पेशा छोड़ने के बाद जीवन का गजारा करना आसान नही था, इस बीच उन्होंने कुछ अनुवाद और कैमिकल वर्क काम शुरू किया। एक बाद अनुवार करने की एक लाइन में मलेरिया की किसी दवा पर असर का जिक्र आया, उन्होंने कहा कि यदि दवा असरदार है तो यह मरीज के साथ ही स्वस्थ मरीज पर भी असर करेगी, दवाओं की पमाणकिता सिद्ध करने का यह बिल्कुल नया तरीका था, जिसे शुरूआत में आसानी से स्वीकार नहीं किया गया, इसके बाद उन्होंने इस मैथेड को लगभग हर बीमारी पर प्रयोग किया, जिसको नाम दिया गया लाइक क्योर लाइक, और धीरे धीरे प्रमाणिकता का यह सबसे प्रमाणित फार्मुला बन गया और आगे चलकर एक बड़ा मेडिकल सिस्टम तैयार किया गया।

स्वस्थ लोगों पर जांच का उनका फार्मुला धीरे धीरे प्रचलन में आ गया, बाद में हनीमैन पैरिस शिफ्ट हो गए, इस समय तक उनकी इस थ्योरी पर विश्वास करने वालों की संख्या काफी अधिक हो गई थी, उस समय भी उनकी इस थ्योरी को काफी लोगों ने अस्वीकार किया, लेकिन उन्होंने उस समय जारी अनैतिक मेडिकल प्रैक्टिस की जगह एक बेहतर और मानवीय मूल्यों पर आधारित विधा की परिपाटी लिखी जो आज लाखों लोगों का भरोसा जीत चुकी है। मैलेनी डी हरवेली से विवाह करने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर इस मिशन को आगे बढ़ाया, जिन्होंने यूरोप के साथ ही भारत और अन्य देशों में भी लोगों का भरोसा जीता। हनीमैन वयोवृद्ध होने के बाद भी बौद्धिक रूप से सक्रिय रहे, और अपनी एथिकल वैल्यू को बरकरार रखते हुए मानवता के लिए जीवन समर्पित कर दिया।

नोट- जानकारी डॉ एके गुप्ता, एकेजीओवीएचएएमएस के फाउंडर और जाने माने होम्योपैथी विशेषज्ञ के सहयोग से जुटाई गई।

 

 

 

 

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