
Standards for UV protective glasses have been set by USFD.
यूएसएफडी द्वारा यूवी संरक्षक चश्मों के लिए मानक तैयार किए हैं
वर्ष 2015 में एम्स आरपी सेंटर द्वारा कराए गए अध्ययन में इन्हें मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया था
नई दिल्ली, सेहत संवाददाता,
बीते एक सप्ताह से मौसम विभाग गर्मी को लेकर चेतावनी जारी कर रहा है, हीट वेव से लेकर सूरज की तेज किरणें बदन जला रही हैं, तेज धूप यानि अत्यधिक यूवी किरणें जिसे ग्लोबल वार्मिंग भी कहा जाता है, अब प्रश्न यह है कि तेज धूप गर्मी ही नहीं, आंखों के लिए भी हानिकारक है तेज धूप की अल्ट्रावायलेट किरणें जिन्हें यूवी यूवी रेज या यूपी किरणें भी कहा जाता है, आंखों की पुतली को प्रभावित कर सकती हैं। इससे बचने के लिए अगर आप यूवी प्रोटेक्टेड गॉगल्स यानि धूप के चश्में का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो पहले यह पुख्ता कर लें कि आपका चश्मा यूवी प्रोटेकटेड है भी या नहीं?
जी हां कुछ समय पहले एम्स के आरपी सेंटर और केंद्र सरकार के अंधता निवारण कार्यक्रम के तहत किए एक अध्ययन में पाया गया कि 75 प्रतिशत धूप के चश्में यूवी किरणों से आंखों की सुरक्षा करने में कारगर नहीं है। दरअसल यूवी संरक्षण के लिए यूएसएफडीए द्वारा कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं, जिन मानकों पर अधिकांश गॉगल्स फेल पाए गए हैं। दरअसल हार्ड रेसिन (सख्त प्लास्टिक) और क्राउन ग्लास दो तरह से यूवी प्रोटेक्टेड चश्मों की गुणवत्ता जांची जाती है। बाजार में मौजूद यूवी ए और यूवी बी श्रेणी चश्मों में शत प्रतिशत यूवी संरक्षण का दावा किया जाता है। जिसमें ग्लास और हार्ड रेसिन की मोटाई निर्धारित मानक से अधिक पाई गई। यूवी संरक्षण के लिए तय 190 से 400 एनएम तक के बीच में चश्मों की जांच की जाती है। जिसकी मात्रा केवल पांच एनएम तक ही पाई गई, जो निश्चित रूप से आंखों की सुरक्षा यूवी किरणों से करने में असफल हैं। गौरतलब है कि तेज धूप के जरिए आंखों तक पहुंचे हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणें भविष्य में आंखों को कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं।
क्या है असुरक्षित गॉगल्स पहनने का खतरा
एम्स के आरपी सेंटर के डॉ राजपाल के अनुसार बीते पांच साल में मई और जून के अलावा अप्रैल महीने में ही सूर्य में यूवी किरणों की मात्रा अधिक देखी गई, जिसके कारण रेडिएशन बढ़ गया, सुरक्षित या यूवी प्रोटेक्टेड गॉगल्स नहीं लगाने से आंखों की पलकों में सूजन, रेटिना को क्षति पहुंचने के साथ ही मोतियाबिंद होने का खतरा भी बढ़ जाता है, फोटो कैरेटोकंजेक्टवाइटिस, कैरेटोपैथी व दृश्यता संबंधी परेशानी भी हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों ने यूवी रेडिएशन के बढ़ते खतरे को देखते हुए गॉगल्स के लिए नये मानक तैयार करने की भी सिफारिश की है।
कैसे होता है परीक्षण
चश्में के रंग, ग्लास की मोटाई और यूवी संरक्षण की जांच के लिए विशेष स्पेक्टोमीटर का इस्तेमाल किया जाता है। चश्में के रंग के लिए पैराअमीनोबैनोज पीएबीए व मेथॉनोल का प्रयोग होता है, जबकि यूवह संरक्षण के लिए 190 से 400 एमए पर स्कैनिंग किया गया। जांच में एंटीग्लेयर लेंस का भी परीक्षण किया जाता है। यूवी400 को सुरक्षित गॉगल्स माना गया है। जबकि भारत में ब्रांडेड कंपनियां 280 एमएन यूवी संरक्षित चश्में बेच रही हैं।
कोई भी करा सकता है जांच
आपका चश्मा या धूप का चश्मा यूवी संरक्षित है या नहीं, इसके लिए एम्स के आरपी सेंटर में संपर्क किया जा सकता है। इसके लिए एम्स आरपी सेंटर में विशेष हाई लैबोरेटरी में यूवी रेडिएशन संरक्षण जांच सुविधा है, जहां चश्में की जांच कर यूवी प्रोटेक्शन के स्तर का पता लगाया जा सकता है। मालूम हो कि तेज धूप की वजह से गर्मी में यूवी संरक्षित गॉगल्स की मांग 80 प्रतिशत बढ़ जाती है।