
नई दिल्ली, सेहत संवाददाता
34 वर्षीय ज्योर्तिमा को लंबे समय से त्वचा पर पानी युक्त छाले और उनमें खुजली की समस्या थी, चेहरे पर गाल और नाक के पास लालिमा बढ़ती जा रही थी। कुछ घरेलू इलाज से भी जब समस्या का हल नहीं हुआ तो त्वचा रोग विशेषज्ञ को दिखाया, जिन्होंने कई तरह की दवाएं और क्रीम दीं लेकिन परेशानी बढ़ती जा रही थी। एक दिन ज्योर्तिमा की एक दोस्त ने कहा कि तुम्हारी इस समस्या का हल त्वचा रोग विशेषज्ञ के पास नहीं है, एक बार एम्स जाकर रिह्यूमेटोलॉजी विभाग में संपर्क करों। अपनी नौकरी से एक दिन की छुट्टी लेकर ज्योर्तिमा एम्स पहुंची, शुरूआती जांच में डॉक्टर ने उसे लूपस होने की बात कही। मालूम हो कि दस मई को विश्व लूपस दिवस मनाया जाता है।
ज्योर्तिमा ने अपनी दोस्त का धन्यवाद दिया, जिससे वह सही समय पर सही डॉक्टर के पास पहुंच पाई। दरअसल लूपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिससे शरीर का रक्षा प्रतिरक्षा तंत्र अपने ही टिश्यू और आर्गन पर हमला कर देता है, तकरीबन 200 तरह की ऑटोइम्यून बीमारियों में लूपस एक प्रमुख बीमारी है, जो त्वचा, जोड़, किडनी, दिल, फेफड़े, मस्तिष्क और ब्लड सेल्स को प्रभावित करती है। इसे एसएसई यानि सिस्टेमेटिक लूपस इरेथेतेटोस भी कहा जाता है। एम्स के रिह्युमेटोलॉजी विभाग की डॉ उमा कुमार कहती हैं कि ऑटोइम्यून बीमारियों में अकसर मरीज पहले कई विभागों में चक्कर लगाते रहते हैं, हमारे पास काफी देर में पहुंचते हैं, त्वचा की लूपस बीमारी के साथ ही रिह्यूमेटॉयड आर्थराइटिस के मरीज भी विकलांगता दिखाई देने पर इस विभाग में पहुंचते हैं, इससे पहले मरीज हड्डी रोग विशेषज्ञ से सलाह लेते रहते हैं। डॉ उमा ने बताया कि लूपस की कई वजहें हो सकती हैं, जिसमें कई बार जेनेटिक, हार्मोनल, एनवायरमेंटल और इम्यून सिस्टम फैक्टर आदि शामिल होते हैं।
लूपस की कुछ प्रमुख वजहें
जेनेटिक फैक्टर- परिवार में पहले से यदि किसी को ऑटोइम्यून बीमारी हो लूपस होने का खतरा बढ़ जाता है। कुछ विशेष तरह के जीन भी ऑटो इम्यून सिस्टम को सेंसिटिव करते हैं, जिसकी वजह से लूपस का प्रभाव बढ़ता है।
हार्मोनल फैक्टर- लूपस में अधिकांशत: महिलाओं में पाया जाता है, रिप्रोडक्टिव उम्र 16 से 49 साल की उम्र में महिलाएं इससे अधिक प्रभावित होती है, एस्ट्रोजन हार्मोन इम्यून सेंसिविटी को प्रभावित करता है, जो कि महिलाओं में रिप्रोडक्टिव उम्र में अधिक सक्रिय रहता है।
एनवायरमेंटल फैक्टर– पारिस्थितकितंत्र की प्रमुख स्थितियां भी लूपस में कारगर साबित होती हैं, सूर्य की रौशनी या यूवी किरणों का सीधे संपर्क, वायरल इंफेक्शन, गंभीर तनाव, स्मोकिंग, प्रदूषण या कैमिकल का एक्सपोजर के साथ ही कुछ प्रमुख तरह की दवाएं भी लूपस को इंड्यूस करती हैं।
इम्यून सिस्टम– जब शरीर का रक्षा प्रतिरक्षा तंत्र यानि हमें बीमारियों से बचाने वाले सुरक्षा कवच ओवर एक्टिव हो जाता है तो शरीर की बीमारियों से रक्षा करने की जगह स्वस्थ सेल्स और ब्लड टिश्यू पर ही हमला करने लगता है, इस स्थिति में लूपस की प्रभाव दिखता है।
क्या लूपस से बचाव संभव है?
हालांकि अभी तक यह संज्ञान में नहीं है कि लूपस से पूरी तरह बचाव संभव है या नहीं, हालांकि बीमारी होने पर इसके फ्लेयर अप या गंभीर अवस्था या ट्रिगर स्थितियों को नियंत्रित किया जा सकता है। धूप में निकलने से पहले यूवी प्रोटेक्टेड क्रीम का इस्तेमाल करें, हाथों और त्वचा को ढककर रखें, धूम्रपान से परहेज करें, यह इंफ्लेशन यानि सूजन को बढ़ाता है। तनावमुक्त रहें, योगा मेडिटेशन के साथ ही नियमित दवाओं का सेवन करते रहें, इलाज के तौर पर इस बीमारी में इम्यूनसेपरेशन दवाएं, एंटीइंफ्लेमेटरी स्टेरॉयड दवाएं और नियंत्रित लाइफ स्टाइल अपनाने की सलाह दी जाती है।
बीमारी के लक्षण
लगातार धकान और कमजोरी महसूस होना
घुटनों या जोड़ों में सूजन और दर्द
त्वचा पर चकत्ते या छोटे लाल दाने, सनलाइट सेंसिविटी
बुखार, बालों का झड़ना, और मुंह पर सुजन, नाक के दोनों तरफ लालिमा, जिसे बटरफ्लाई रैसेज भी कहा जाता है।