
- IMS-BHU में सर्जरी विभाग की PGY-1 रेज़िडेंट द्वारा आत्महत्या का प्रयास, कोमा में भर्ती — रेज़िडेंट डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रश्न
वाराणसी:
आईएमएस-बीएचयू (Institute of Medical Sciences, Banaras Hindu University) के सर्जरी विभाग की एक PGY-1 रेज़िडेंट डॉक्टर द्वारा कथित रूप से आत्महत्या का प्रयास किए जाने की सूचना प्राप्त हुई है। जानकारी के अनुसार, उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है और वर्तमान में वेंटिलेटरी सपोर्ट पर रखा गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, विभागीय वातावरण और कार्यस्थल के दबाव को लेकर लंबे समय से रेज़िडेंट डॉक्टरों में तनाव की स्थिति बनी हुई थी। इसी प्रकार की एक घटना पूर्व में भी सामने आई थी, जिसमें सर्जरी विभाग के ही एक अन्य PGY-1 रेज़िडेंट डॉक्टर द्वारा आत्महत्या का प्रयास किया गया था, हालांकि उस मामले में डॉक्टर की जान बच गई थी। इन घटनाओं ने मेडिकल संस्थानों में कार्यरत युवा डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य, कार्यस्थल के वातावरण और प्रशिक्षण प्रणाली को लेकर गंभीर चिंताएँ खड़ी कर दी हैं।
इस संदर्भ में Democratic Medical Association उत्तर प्रदेश (DMA UP) ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह घटना केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर के मेडिकल संस्थानों में रेज़िडेंट डॉक्टरों के सामने मौजूद व्यापक मानसिक स्वास्थ्य संकट की ओर संकेत करती है। DMA UP का मानना है कि मेडिकल प्रशिक्षण के दौरान अत्यधिक कार्यभार, लंबे कार्य घंटे, लगातार ड्यूटी, नींद की कमी तथा कई बार प्रतिकूल कार्यस्थल वातावरण युवा डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालते हैं।
DMA UP ने यह भी कहा कि विभिन्न अध्ययनों के अनुसार पहले वर्ष के 57% से अधिक मेडिकल छात्र गंभीर तनाव का अनुभव करते हैं, जबकि रेज़िडेंट डॉक्टरों में लगभग 17.8% उच्च व्यक्तिगत बर्नआउट और 14% उच्च कार्य-संबंधी बर्नआउट पाया गया है। इसके अतिरिक्त लगभग 47.8% रेज़िडेंट डॉक्टरों में मरीजों से जुड़े मध्यम स्तर के बर्नआउट की स्थिति देखी गई है। कुछ अध्ययनों में तो तृतीयक चिकित्सा संस्थानों में 75% तक रेज़िडेंट डॉक्टरों में बर्नआउट की बात भी सामने आई है।
DMA उत्तर प्रदेश ने इस घटना को अत्यंत गंभीर मानते हुए कहा है कि चिकित्सा संस्थानों में कार्यरत रेज़िडेंट डॉक्टरों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और सहयोगात्मक कार्यस्थल वातावरण सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। संगठन ने मेडिकल कॉलेजों और संबंधित प्रशासन से आग्रह किया है कि इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता तंत्र, काउंसलिंग सुविधाएँ, उचित कार्य-घंटों का पालन, और शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत किया जाए।
DMA UP का यह भी मानना है कि डॉक्टरों का मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र से जुड़ा हुआ विषय है। यदि युवा डॉक्टर लगातार तनाव, थकान और मानसिक दबाव का सामना करेंगे, तो इसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली में मानव-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया जाए, जिसमें डॉक्टरों के कल्याण को भी उतनी ही प्राथमिकता दी जाए जितनी मरीजों की सेवा को।
DMA उत्तर प्रदेश ने संबंधित संस्थान एवं प्रशासन से इस मामले की निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की है। संगठन ने यह भी कहा कि रेज़िडेंट डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक संवाद और नीति-स्तरीय सुधार की आवश्यकता है।