
लखनऊ, उत्तर प्रदेश, सेहत संवाददाता
डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश (DMA UP) ने विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स (FMG) से संबंधित हालिया नोटिस पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि कोविड-19 महामारी एक अभूतपूर्व वैश्विक आपदा थी, जिसके कारण दुनिया भर की शिक्षा व्यवस्था बाधित हुई और आपातकालीन परिस्थितियों में ऑनलाइन कक्षाओं का सहारा लेना पड़ा। मालूम हो कि हाल ही में नेशनल मेडिकल कमिशन द्वारा जारी एक आदेश में कहा गया है कि ऐसे विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स, जिन्होंने कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन क्लास के जरिए एमबीबीएस शिक्षा पूरी की है, उन्हें भारत में प्रैक्टिस करने के लिए ऑनसाइट ट्रेनिंग और इंटर्नशिप पूरी करनी होगी।
डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश का मानना है कि महामारी के दौरान ऑनलाइन कक्षाएं किसी प्रकार का नियम उल्लंघन नहीं थीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों में अपनाया गया एक आवश्यक और व्यावहारिक समाधान था। विश्वभर की विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों ने छात्रों की शिक्षा को जारी रखने के लिए यह व्यवस्था अपनाई थी। ऐसे में वर्षों बाद उन छात्रों को दंडित करना, जिन्होंने अपने विश्वविद्यालयों के निर्देशों का पालन करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की, न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
संगठन ने कहा कि FMG छात्र भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। कोविड-19 जैसी आपदा के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता और अधिक स्पष्ट हुई है। ऐसे में योग्य और प्रशिक्षित डॉक्टरों को अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के कारण परेशान करना न केवल छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय है, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है।
DMA UP ने संबंधित प्राधिकरणों से अपील की है कि इस पूरे मामले को संवेदनशीलता और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तथा उन छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उचित और न्यायसंगत समाधान निकाला जाए। डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश ने स्पष्ट किया कि महामारी के कारण उत्पन्न परिस्थितियों के लिए छात्रों को जिम्मेदार ठहराना न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायसंगत। संगठन FMG छात्रों के साथ मजबूती से खड़ा है और उनके हितों की रक्षा के लिए अपनी आवाज उठाता रहेगा।