ORS मामले में FSSAI नरम, बाजार में अब भी मिल रहे हाई शुगर ओआरएस

FSSAI softens its stance on ORS, high sugar ORS still available in the market
FSSAI softens its stance on ORS, high sugar ORS still available in the market
  • हैदराबाद की पीडियाट्रिशियन डॉ शिवरंजनी संतोष की आठ साल की मेहनत रंग लाई
  • हाई कोर्ट और एफएसएसआई ने जेएनटीएल कंपनी को दी थी दो सप्ताह की मोहलत

नई दिल्ली,

दो सप्ताह पहले ही ओरआरएस (WHO ORS) घोल से जुड़ी एक खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुई और अचानक से बचपन का एक दौर आंखों के सामने आ गया, जबकि बीमार होने पर झट पट से बन जाने वाला ओआरएस घोल बना कर पिलाया जाता था, वहीं डब्लूएसओ ओआरएस (WHO ORS) अब कंपनियों के हाथ का खिलौना बन गया है। डिहाइट्रेशन और वर्कआउट के बाद पानी की कमी को पूरा करने के लिए दिए जाने वाली इस हेल्दी सॉल्यूशन के इतने अनहेल्दी सॉल्युशन बाजार में बेचे जा रहे हैं, जिनपर कभी किसी का ध्यान ही नहीं गया। हैदराबाद की पीडियाट्रिशियन डॉ शिवरंजनी संतोष ने आठ से दस साल पहले इस मामले को प्रमुखता के साथ उठाया, लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, फैसला उनके हक में भी आया, लेकिन दो दिन बाद ही नई कहानी शुरू हो गई। दिल्ली हाईकोर्ट और एफएसएसआई ने जेएनटीएल कंपनी को राहत दी और अपना पक्ष रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया, दो सप्ताह पूरे होने के बाद भी आदेश पर अमल नहीं हुआ और सुपर बाजारों में हाई शुगर युक्त ओआरएस देखे गए।

15 अक्टूबर को द फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऑर्थेरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने एक एडवाइजरी जारी करते हुए ऐसे सभी ओआरएस या ओरल डिहाइड्रेशन सॉल्ट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्धारित मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं, अधिकांश ब्रांडेड कंपनियां ओआरएसएल, ग्लूकॉन डी आदि के नाम से ओआरएस के विकल्प बाजार में बेच रही हैं, जिसमें शुगर काफी अधिक मात्रा में होता है, जिससे डिहाइट्रेशन के शिकार बच्चों को दिए जाने पर कई तरह के स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। दस गुना अधिक शुगर के साथ बेचे जाने वाले ओआरएस प्रतिबंधित किए जाने के एफएसएसआई के फैसले की सभी ने सराहना की, तीन दिन बाद ही दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले को संज्ञान में लेते हुए कंपनी को अंतरिम राहत देते हुए सात दिन का समय दिया और अपना पक्ष रखने की बात कही, इसमें कंपनियों ने मौजूदा 150 करोड़ का स्टॉक बाजार में होने और ब्रांड इमेज खराब होने का हवाला भी दिया। दो सप्ताह बीत जाने के बाद अब गेंद एफएसएसआई के पाले में हैं।

लंबी कोर्ट की लड़ाई लड़ने वाली डॉ शिवरंजनी संतोष ने सेहत365डॉट कॉम से कहा कि केंद्र सरकार को इस मामले को संज्ञान में लेना चाहिए स्टॉक खत्म करने का हवाला देकर कंपनियां फिर अधिक शुगर वाला ओआरएस लेबलिंग का घोल बच्चों तक पहुंचाएगीं, जिससे फायदा होने की जगह नुकसान अधिक होता है, डॉ शिवरंजनी ने कहा कि केवल ओआरएस ही नहीं ऐसे सभी हेल्थ ड्रिंक्स जिसमें शुगर की मात्रा अधिक हैं प्रतिबंधित किए जाने चाहिए।

हालांकि कंपनियों की दलील पर भारतीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया है, संभवत: सोमवार से शुरू होने वाले सप्ताह में इस विषय पर नया दिशानिर्दश जारी किया जाए।

ओआरएस को बनाने में भारतीय चिकित्सक का अहम योगदान

ओआरएस को 20वीं सदी में विकसित किया गया, जिसको तैयार करने में कई जाने माने वैज्ञानिकों का योगदान रहा, इसमें भारतीय विशेषज्ञ डॉ दिलीप महालनोबिस के सहयोग को कभी भुलाया नहीं जा सकता। यूएएस के तीन वैज्ञानिकों के बाद भारतीय चिकित्सक डॉ दिलीप ने ओआरएस को सर्व सुलभ डिहाइड्रेशन सॉल्युशन के रूप में पहचान दिलाई। ओआरएस का पहला क्लिनिकल ट्रायल वर्ष 1968 से 1969 के बीच बांग्लादेश में आए कॉलरा बीमारी के दौरान किया गया, इस समय डॉ दिलीप ने जॉन्स हॉपकिन्सन सेंटर फॉर मेडिकल रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर कोलकाता के साथ मिलकर ओआरएस को विकसित करने का काम किया। उन्होंने बताया कि किसी भी आई वी फ्लूड से कहीं बेहतर है साधारण नमक, पानी और चीनी के घोल को बच्चों को देने, जो कुछ ही समय में डिहाइड्रेशन या फिर शरीर में इलेक्टोलायट इंबैलेंस को दूर कर सकता है। सही मात्रा या अनुपात में चीनी, नमक और पानी का यह घोल सोडियम और पानी को तुरंत घुलने में मदद करता है, जिससे शरीर में डायरिया या वर्कआउट के बाद हुई पानी की कमी को दूर किया जा सकता है।

24 घंटे के भीतर प्रयोग किया जाए घोल

ओआरएस के सही प्रयोग को लेकर समय समय पर जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं, 200 ग्राम या एक गिलास पानी में एक पैकेट डब्लूएचओ रिकमेंडेड ओआरएस के घोल को 24 घंटे तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिसके इससे अधिक समय होने पर इसे नहीं पीना चाहिए। शरीर में पानी की कमी होने पर यह तुरंत कमी को दूर करने में सहायक है, लेकिन अधिक चीनी वाले या सही अनुपात नहीं होने पर इसका नुकसान भी संभव है।

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