
देश को साल 2025 तक टीबी (Tuberculosis) मुक्त बनाने के लिए दर्जनों बार टीबी रोगी खोज अभियान चलाए गए। हर अभियान के बाद दावा किया गया कि अब हम लक्ष्य के करीब है। मगर अगले अभियान में फिर संक्रमित मरीज सामने आए। अब साल 2026 आ गया है और विशेषज्ञ मानते हैं कि लक्ष्य अभी भी दूर है। 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस (World TB Day) मनाया जाएगा और स्वास्थ्य विभाग के सामने यह सवाल होगा कि टीबी मुक्त भारत बनाने की चुनौती वह कैसे पार करेंगे।नेशनल टीबी टास्क फोर्स के उपाध्यक्ष पद्मश्री प्रो. राजेन्द्र प्रसाद ( Dr Rajendra Prasad) के अनुसार बीते कुछ वर्षों में टीबी मामलों में कमी जरूर आई है, लेकिन अभी भी जांच में नए मरीज मिल रहे हैं। टीबी के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती मरीज का रोग के लक्षणों की अनदेखी करना। लोग ऐसा अंदेशा तो जताते हैं कि उन्हें टीबी हो सकती है मगर जांच कराने स्वास्थ्य केन्द्र नहीं जाते।
रोग को फैलाने में उन मरीजों का भी योगदान है जो खुद का इलाज बीच में छोड़ देते हैं और दूसरों को संक्रमित करते रहेे हैं। करीब 15-20 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं जो किन्हीं कारण से पूरा इलाज नहीं कराते। दवाएं समय से नहीं लेते। यह अधूरा इलाज एमडीआर टीबी के रूप में और भी घातक हो जाता है, जिससे न सिर्फ मरीज की जान को खतरा होता है बल्कि संक्रमण भी फैलता है।
इलाज में देरी व अधूरा इलाज बड़ी चुनौती : डा. राजेन्द्र

डा. राजेन्द्र प्रसाद का कहना है कि टीबी के उपचार में अब ऐसी दवाएं व जांच की तकनीकी आ गयी हैं कि बीमारी को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि मरीज समय ेसे इलाज शुरू करें। टीबी से होने वाली अधिकांश मौंतों की वजह देर से इलाज शुरू करना है। वह कहते हैं कि करीब 15 फीसदी मरीज टीबी का इलाज देर से शुरू करते हैं। इससे पहले वह बुखार-खांसी का काफी इलाज कराने के बाद टीबी की जांच कराते हैं, जिससे बीमारी इतनी ज्यादा बढ़ चुकी होती है कि कई बार मरीज को बचा पाना मुश्किल हो जाता है।
कुपोषण एक बड़ी वजह
देश में टीबी एक बड़ी वजह सामाजिक-आर्थिक भी है। पौष्टिक भोजन के आभाव के कारण कई बच्चे कुपोषित हो जाते हैं जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि सरकार की ओर से टीबी मरीजों के लिए पोषण सहायता और मुफ्त इलाज जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन कई जगह इनका लाभ समय पर नहीं मिल पा रहा है। फंड की कमी और प्रशासनिक ढिलाई भी समस्या को बढ़ा रही है। दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में जांच और इलाज की सुविधाएं सीमित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी पर नियंत्रण के लिए समय पर पहचान, इलाज का पूरा पालन, पोषण सहायता और जागरूकता बढ़ाना जरूरी है।
अधूरा इलाज दूसरों से के लिए भी खतरा: डा. अजय कुमार वर्मा
उत्तर प्रदेश में लगभग 6.9 लाख टीबी मरीज पंजीकृत हैं। ऐसे में यदि 3 प्रतिशत मरीज भी इलाज छोड़ते हैं, तो यह संख्या हजारों में पहुंच जाती है, जो न केवल खुद के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरा बन जाती है। डा. राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के पल्मोनरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजय कुमार वर्मा का (Dr Ajay Kumar Verma) कहना है कि जो मरीज इलाज बीच में छोड़ देते हैं, वे Silent Transmitters बन जाते हैं, यानी वह अनजाने में बीमारी फैलाते रहते हैं। इतना ही नहीं, अधूरा इलाज दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR-TB) को जन्म देता है, जिसका इलाज और अधिक लंबा, महंगा और जटिल होता है। उनका कहना है कि टीबी की दवा एक बार शुरू होने पर दवाएं बीच में बंद नहीं करनी चाहिए। यह स्थिति टीबी बीमारी को और भी गम्भीर बना देती है। जब मरीज दुबारा दवाएं शुरू करता है तो शरीर में मौजूद टीबी बैैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर चुके होते हैं और दवाएं असर नहीं करती। यही अधूरा इलाज सामान्य टीबी को खतरनाक एमडीआर (Multi drug resistance) या एक्सडीआर (Extensively Drug-Resistant) टीबी में बदल सकता है। एमडीआर टीबी में तो मुख्य दवाएं ही बेअसर हो जाती हैं, जबकि एक्सडीआर टीबी एमडीआर से भी खतरनाक होती है, इसमें कोई दवाएं असर ही नहीं करती। एमडीआर और एक्सडीआर टीबी के बढ़ते मामले इस बात का संकेत हैं कि हमें सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि मरीजों की काउंसलिंग और फॉलोअप पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
इन लक्षणों पर दें ध्यान
स्वास्थ्य मंत्रालय ने टीबी के बारे में लोगों को जागरूक करते हुए 10 लक्षण बताए हैं, जिनपर ध्यान देते रहना सभी के लिए जरूरी है। अगर इनमें से हफ्तों से 3-4 लक्षण भी बने हुए हैं तो इसकी जांच जरूर कराएं।
1. लगातार दो हफ्ते तक खांसी
2. शाम को बुखार
3. वजन का तजी से कम होना
4. थूक के साथ खून आना
5. रात को पसीना आना
6. थकान और कमजोरी महसूस होना
7. शरीर के किसी भी भाग में गांठ होना
8. सीने में दर्द
9. शरीर में अचानक हो रहे बदलाव
10. सांस से संबंधित क्रानिक बीमारी
ऐसे करें बचाव
-टीबी से बचाव के लिए बच्चों को जन्म से एक माह के अंदर टीबी का टीका लगवाएं
-खांसते समय मुंह पर रूमाल रखें
– शराब का सेवन व धूम्रपान न करे

Senior Correspondent