
- प्रदुषण का गंभीर असर आंखों पर, दवाएं बढ़नी पड़ रही है
- एम्स के आरपी सेंटर के डॉ राजेश सिन्हा ने बताई अहम बातें
नई दिल्ली
सर्दियों में ठंड से बचने के कई उपायों के बीच इस बात का भी ध्यान रखें कि ठंड का असर आंखों पर तो नहीं पड़ रहा, दरअसल साधारण ड्राई आई की समस्या सर्दियों में और भी गंभीर हो जाती है, जिसकी कई वजहें हो सकती है। एम्स के नेत्ररोग विशेषज्ञ ने बताया कि हीटर या ब्लोअर का इस्तेमाल, मोबाइल या लैपटाप पर लंबे समय तक काम करना और इसके साथ ही वायु प्रदूषण जैसी स्थिति ड्राई आईज से जुड़ी समस्याओं को ट्रिगर कर देती, जिसका असर यह होता है कि लोगों की आंखों से पानी बहना या चुभन होने लगती है। इससे बचने के लिए ओटीसी दवाएं लेने की जगह डॉक्टर से सलाह लेकर ही आई ड्राप्स इस्तेमाल करने चाहिए।
एम्स के आरपी सेंटर के ऑप्थेमोलॉजिस्ट डॉ राजेश सिन्हा ने बताया कि यदि किसी को सामान्य दिनों में भी ड्राई आई रहती है और प्रदूषण की वजह से दिक्कल बढ़ रही है तो एक बार चिकित्सक से मिलकर दवाएं लें। डॉ सिन्हा ने बताया कि प्रदूषण के कारण अन्य कई फैक्टर मिलकर आंखों की तकलीफ को बढ़ा रहे हैं, पहले ड्राई आई के जिन मरीजों को हम दिन में चार बार दवा डालने की सलाह देते थे, उन्हें आराम नहीं होने पर डोज बढ़ाने की सलाह दी जा रही है, कई बार जब डोज ल्यूब्रिकेटिंग ड्राप्स की डोज बढ़ाने के बाद भी लोगों को आराम नहीं होता फिर हम उन्हें स्टेरॉयड दवाओं के इस्तेमाल के लिए कहते हैं, इसलिए सलाह यह है कि चिकित्सक की सलाह के बिना ओटीसी या ओवर द काउंटर स्टेरॉयड दवाओं का प्रयोग नहीं करें। दरअसल प्रदूषण में आंखों में इंफ्लेमेशन जिसे ऑफलेस सरफलेक्स इंफ्लामेशन कहते हैं की वजह से सिर्फ ल्यूब्रिकेटिंग आईड्राप्स से आराम नहीं पड़ता, ऐसी स्थिति में स्टेरॉयड आईड्राप्स का प्रयोग किया जाता है।
डॉ सिन्हा कहते हैं कि शुरूआती चरण में मरीजों को आंखों को किसी कुशल चिकित्सक को दिखाना चाहिए, बिना सलाह के ल्यूब्रिकेटिंग आईड्राप्स लिए जा सकते हैं लेकिन यदि ड्राई आईस की समस्या अधिक गंभीर नहीं है तो, एम्स में मरीजों की परेशानी के अनुसार वॉक इन पेशेंट भी देखे जाते हैं। बावजूद इसके दिल्ली एनसीआर में लोगों को को ल्यूब्रिकेटिंग आई ड्राप्स का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए, इसके लिए कम से कम एक बार चिकित्सक की सलाह भी ले लें।
डॉ सिन्हा ने बताया कि लैपटॉप और मोबाइल के अधिक इस्तेमाल की वजह से आंखों में प्राकृतिक ल्यूब्रिकेटिंग नहीं हो पाता, एवेरोपरेटिव टाइप ऑफ ड्राई आइज इसी श्रेणी में शामिल हैं अमूमन सामान्य अवस्था में एक व्यक्ति एक मिनट में दस से बारह बार पलकों को झपकाता है, जिससे मॉशइस्ट या चिकनाहट बनी रहती है, लेकिन मोबाइल और लैपटॉप पर नियमित संपर्क में रहने की वजह से एक मिनट में ब्लिंक रेट घटकर चार या पांच मिनट रह जाता है। ऐसी स्थित में टियर फिल्म ऐवोपरेट तेजी से होती है, पारिस्थितिक तंत्र या हमारे आसपास का वातावरण भी इसे ट्रिगर करने में सहायक है उदाहरण के लिए हम सर्दियों में ब्लोअर या हीटर चलाते हैं, इससे ड्राई नेस बढ़ जाती हैं, आपने आंखें खुली भी रखी है, कमरा भी ड्राई आदि स्थितियां मिलकर आंखों की समस्या को बढ़ाने में कारगर हैं।
यह उपाय अपनाएं
- डॉक्टर की बिना सलाह स्टेरॉयड ड्राप्स न लें
- इस बात पर नजर रखें कि आंखों को प्रत्येक मिनट में दस 12 बार झपकाते रहें
- रोजाना सुबह आंखों को ठंडे पानी से धोएं
- लगातार ब्लोअर या हीटर युक्त कमरे में नहीं रहें
- आंखों के आसान योगा का नियमित अभ्यास करें
- आंखों से पानी आने पर विशेषज्ञ की सलाह लें

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