बायोसिंथेटिक कार्निया से लौटेगी आंखों की रोशनी

The Annual Conference of Indian Society of Cornea & Keratorefractive Surgeons (ISCKRS) is being organised from 1st to 3rd August, 2025 at Le Méridien, New Delhi.
The Annual Conference of Indian Society of Cornea & Keratorefractive Surgeons (ISCKRS) is being organised from 1st to 3rd August, 2025 at Le Méridien, New Delhi.
  • एम्स के राजेन्द्र प्रसाद नेत्र चिकित्सालय ने 70 मरीजों पर किया सफल परीक्षण
  • इंडियन सोसाइटी ऑफ कार्निया एंड केरोटोरेफ्ररेक्टिव सर्जन की वार्षिक कांफ्रेस का आयोजन

नई दिल्ली

दृष्टिबाधित लोगों के लिए एम्स से एक अच्छी खबर है, नेत्रदान पर निर्भर रहने वाले ऐसे लोगों के लिए कार्निया डोनेशन के साथ ही एक और विकल्प जुड़ गया है, जिसे बायोसिंथेटिक कार्निया कहा जाता है। बीते सात साल में एम्स के आरपी सेंटर ने 70 मरीजों पर बायोसिंथेटिक कार्निया का सफल प्रयोग किया है। सभी मरीजों पर यह प्रयोग शोध के तहत किया गया। बायोसिंथेटिक कार्निया का यदि शत प्रतिशत प्रयोग सफल रहा तो यह देश के अंधता निवारण कार्यक्रम में मील का पत्थर साबित हो सकता है, जिसमें कार्निया डोनेशन के लिए लंबा इंतजार, कार्निया संरक्षण और उचित मरीज आदि की तलाश लगभग खत्म हो जाएगी। बायोसिंथेटिक कार्निया ट्रांसप्लांट के साथ ही कार्निया इंप्लांट में बीते एक दशक में कई नये प्रयोग किए गए है, जिसमें एक कार्निया से कई लोगों के आंखों की रौशनी वापस लाना, कार्निया संरक्षण का समय 72 घंटे अधिक होना और क्षतिग्रस्त कार्निया के हिस्से को ठीक करना आदि शामिल है।

इंडियन सोसाइटी ऑफ कार्निया एंड केरोटोरेफ्ररेक्टिव सर्जन की वार्षिक कांफ्रेस में कार्निया प्रत्यारोपण, मायोपिया, एम्लोपिया सहित कई विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। एम्स के आरपी सेंटर यानि राजेन्द्र प्रसाद नेत्र चिकित्सालय की डॉ नम्रता शर्मा ने बताया कि दृषिटबाधिता को दूर करने के लिए हमने सात साल पहले स्वीडन की एक कंपनी के साथ बायोसिंथेटिक कार्निया लगाने पर काम किया, सात साल में 70 मरीजों पर बायोसिंथेटिक कार्निया प्रयोग लगाया गया है, जिसके परिणाम काफी संतोषजनक है, सभी मरीजों का विजन काफी हद तक सही हो गया है। बायोसिंथेटिक कार्निया को कृत्रिम कार्निया भी कहा जाता है, जिसे कोलजेन टाइप वन से लैबोरेटरी में तैयार किया जाता है, शोध के लिए चयनित इन मरीजों की आंखों में इंफेक्शन या आंख में किसी तरह की चोट की वजह से विजन पर प्रभाव पड़ा हुआ था। डॉ नमृता ने बताया कि ह्यूमन कार्निया के एवज में बायो सिंथेटिक कार्निया के रिजेक्शन का खतरा कम होता है। शुरूआत में जिन मरीजों को सिंथेटिक कार्निया लगाया गया है वह निशुल्क है, शोध पूरा होने के बाद इसके प्रयोग की गाइडलाइन के साथ ही कीमत भी तय की जाएगी।

मुखर्जी आई क्लीनिक सीआर पार्क के डॉ राजीव मुखर्जी ने बताया कि नेत्रदान में अन्य तकनीक भी प्रयोग की जा रही है, पहले एक कार्निया से एक ही व्यक्ति को सही किया जाता था, जबकि अब कार्निया के विभिन्न टिश्यू संरक्षित कर एक नेत्रदान से कई लोगों के जीवन का अंधेरा दूर किया जा सकता है। इसके साथ ही पहले कार्निया डोनेट करने के लिए नेत्रदान करने वाले की पूरी आंख निकाली जाती थी, जबकि अब ऐसा नहीं है अब केवल आंखों की ऊपरी झिल्ली को लिया जाता है, जिससे मृतक के परिवारों की संवेदनाएं भी आहत न हो। कार्निया संरक्षण का समय भी अब 72 घंटे से अधिक हो गया है। डॉ मुखर्जी ने कहा कि आंखों के विजन की अगर बात करें तो आजकल कम उम्र में भी बच्चों का विजन प्रभावित हो रहा है, इसके लिए चार साल के बाद नियमित विजन चेक कराते रहना चाहिए, क्योंकि बच्चों का भी स्क्रीन टाइम बढ़ रहा है, और यदि उन्हें चीजें ब्लर या धुंधली दिखाई देनी शुरू होती है तो वह बता भी नहीं पाते, यही समस्या आगे चलकर मायोपिया में बदल जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्वभर में 50 प्रतिशत लोग मायोपिया के शिकार होगें, इसमें विजन पूरी तरह खत्म हो जाता है। अभी तीस प्रतिशत लोग इस समस्या के शिकार हैं।

मालूम हो कि इंडियन सोसाइटी ऑफ कार्निया एंड केरोटोरेफ्ररेक्टिव सर्जन के सौ साल पूरे होने के अवसर पर एम्स सहित कई विशेषज्ञों ने कार्निया इंप्लांट सहित आंखों के विजन और कई समस्याओं पर अपनी बात रखी। जिसमें एम्स आरपी सेंटर के प्रमुख और सोसाइटी के जनरल सेक्रेटरी डॉ राजेश सिन्हा, सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ जेएस टिटियाल, नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ ऋषि मोहन, डॉ अजय दवे सहित कई डॉक्टर उपस्थित थे।

 

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