इस्तेमाल किए गए नैपकिन का कचरा भी बन सकता है जैविक खाद

Highlighting the importance of menstrual health, hygiene, and environmentally responsible disposal of sanitary waste, an awareness workshop on Menstrual Hygiene Management (MHM) was organized at the Indian Women’s Press Corps (IWPC), New Delhi,
Highlighting the importance of menstrual health, hygiene, and environmentally responsible disposal of sanitary waste, an awareness workshop on Menstrual Hygiene Management (MHM) was organized at the Indian Women’s Press Corps (IWPC), New Delhi,

नई दिल्ली, सेहत संवाददाता

भारत में हर साल लगभग 12.3 अरब सैनिटरी पैड्स उपयोग के बाद कचरे में बदल जाते हैं, कूड़े में नालियों में या फिर डंपिंग ग्राउंड मे फेकें गए इन पैंड्स हर से हर साल 1.13 लाख अपशिष्ट उत्पन्न होता है। अधिकांश पैड्स क्योंकि प्लास्टिक आधारित सामग्री से बनाए जाते हैं, इसलिए उनका सुरक्षित निस्तारण पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ठोस अपशिष्ठ प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। बात क्योंकि देश में स्वच्छता अभियान की हो रही है, तो इस अहम पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इस दौरान कुछ कंपनियों ने बायो डिग्रेबल पैड्स भी बाजार में उतारे हैं, जिसका प्रचलन अभी बहुत कम या फिर नहीं के बराबर है, एक दूसरा उपाय सैनेटरी पैड्स इंसिनिरेटर भी है, जिसको देश में लांच किया जा चुका है। सोसाइटियों, पार्क, ऑफिस, कार्यालयों या फिर अधिक महिला समूहों वाले संगठनों में इन मशीनों को लगाया जा सकता, जिसकी अभी कई व्यवहारिक चुनौतियां है, आज बात करेंगे, महिलाओं के मासिक धर्म के जुड़े कचरे के एक बड़े माध्यम प्रयोग किए गए सैनेटरी पैड्स के निस्तारण और इसके रियूज की संभावनाओं पर

भारत में प्रयोग किए गए सैनेटरी पैड्स को सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट 2016 के तहत सैनेटरी वेस्ट श्रेणी में रखा गया है। जिसके अनुसार प्रयोग किए गए पैड्स को अन्य घरेलू कचरे से अलग करके सुरक्षित तरीके से संक्रहित और निस्तारित किया जाना चाहिए, इस संदर्भ में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानि सीबीसी ने भी विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए है, लेकिन बहुत ही कम समाज सेवी संगठन या फिर खुद सरकारें इस विषय पर कभी महिलाओं को जागरूक करती हैं कि सैनेटरी पैड्स का सही निस्तारण भी मासिक धर्म स्वच्छता जागरूकता के तहत ही माना जाना चाहिए। अधिकांश महिलाएं पैड्स को कागज या फिर पन्नी में लपेटकर गीले कचरे के साथ फेंक देती हैं, जिससे बात में कचरा बीनने वालों को भी संक्रमण का खतरा बना रहता है।

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली स्वयं सेवी संस्थाओं ने कई बार प्रयोग किए गए पैड्स से वातावरण को होने वाले खतरों के प्रति अगाह करने वाली रिपोर्ट्स भी प्रकाशित की हैं। इस संदर्भ में काम करने वाली संस्था मैन्सट्रूअल हाइजीन एलायंस ऑफ इंडिया लंबे समय से इस विषय को प्रमुखता के साथ उजागर कर रही है कि प्रयोग किए गए पैड्स का सही निस्तारण क्यों जरूरी है। अनुचित तरीके से फेंके गए पैड्स नालों, लैडफिल साइट्स, जल संसाधनों को प्रदूषित करते हैं क्योकि पैड्स की प्रमुख लेकर में एसएपी यानि सुपर अब्जरवेंट पॉलिमर, पानी या फिर पैड्स को फ्लैश करने से यह पानी में भीगकर फूल जाता है, जिससे नालियां चोक हो सकती है। वहीं यदि पैड्स को निर्धारित तापमान से कम तापामन पर जलाया जाता है, इसके हानिकारक तत्व नहीं जल पाते।

आईसीएमआर की ग्रेड ए वैज्ञानिक डॉ नीता कुमार कहती हैं कि मासिक धर्म के दौरान स्त्रावित होने वाले रक्त में कई इंडोमेट्रियल टिश्यू, प्रोटीन, श्वेत रक्त कोशिकाएं, सुक्ष्म मात्रा में आयरन, कैल्शियम, मैगनीशियम, फास्फोरस जैसे खनिज तत्व होते हैं, यदि एक उच्च तापमान पर यानि 800 या 900 डिग्री सेटिग्रेट पर इसे जलाया जाएं तो अधिकांश पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, बावजूद इसके राख में पोटेशियम, मैग्निशियम और अन्य खनिक की उपस्थिति से इंकार नहीं किया जा सकता, इसको जैविक खाद के रूप प्रयोग करने पर वैज्ञानिक या कृषि वैज्ञानिक विचार कर सकते हैं। जिसपर अभी अधिक शोध कार्य किया जाना चाहिए। फिर प्रश्न यह भी है कि रक्त स्त्राव को सोखने के लिए प्रयोग किए गए पैड्स में प्रयोग की गई प्लास्टिक के बाद कितने जरूरी तत्व रह जाते हें। क्योंकि 57 प्रतिशत से अधिक महिलाएं मासिक धर्म के दौरान अब पैड्स का इस्तेमाल करने लगी है, ग्रामीण इलाकों में कुछ जगह अभी कपड़ा प्रयोग किया जाता है, जो अब व्यवहारिक नहीं माना जाता।

कुछ कंपनियां पैड्स जलाने के विकल्प को लेकर बाजार में उतरी है, जिससे शायद इस समस्या का कुछ हद तक समाधान हो सके। दोहा सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड की प्रमुख मृणालिनी राव ने बताया कि मासिक धर्म स्वच्छता का दायरा सिर्फ़ सैनिटरी नैपकिन के इस्तेमाल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उनके सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से निपटान की प्रक्रिया भी शामिल है। उन्होंने बताया कि हालांकि सैनिटरी पैड का इस्तेमाल काफी बढ़ा है, लेकिन गलत तरीके से निपटान करने से पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं। कंपनी द्वारा बनाए गए इंसिनिरेटर प्रयोग किए गए पैड्स के सही निस्तारण पर जोर देती है, जिससे बनी राख को आगे प्रयोग किया जा सकता है। सही तरीके से पैड्स का निस्तारण नहीं होने पर 98 प्रतिशत पैड्स लैंडफिल साइट्स पर पहुंच जाते हैं।

हालांकि केंद्र सरकार भी इस समस्या के प्रति गंभीर है, इसी उद्देश्य से वर्ष 2023 में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन नीति यानि एमएचएम तैयार की गई, जो न सिर्फ मासिक धर्म के दौरान हाइजीन को बढ़ावा देने पर जोर देती है, बल्कि प्रयोग पैड्स के सही निस्तारण की भी पैरवी करती है। समय बदला और मासिक धर्म के दौरान वर्जनाएं भी कम हुई, कपड़े की जगह मेंस्ट्रूल कप और पैड्स ने ली, निस्तारण एक अलग मुद्दा पैड्स को सही तरीके से जलाकर या बायो डिग्रेडेबल पैड्स प्रयोग करके भी पर्यावरण को संरक्षित किया जा सकता है, इसपर अभी महिलाओं को अधिक जागरूक होने की जरूरत है, समय आएगा और पैड्स की जगह सुरक्षित निस्तारण को भी स्वीकार किया जाएगा।

निशि भाट

स्वास्थ्य पत्रकार

 

 

 

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