
नई दिल्ली, सेहत संवाददाता
देश में कैंसर के इलाज में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली जीवनरक्षक दवाओं सिस्प्लैटिन (Cisplatin) और कार्बोप्लैटिन (Carboplatin) की कमी ने मरीजों और चिकित्सकों की चिंता बढ़ा दी है। अस्पतालों में इन दवाओं की आपूर्ति प्रभावित होने के बीच केंद्र सरकार ने इनके दाम बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। देर शाम इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सकुर्लर जारी किया गया।
इससे पहले दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ डॉ. श्याम अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को टैग करते हुए इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने लिखा कि सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन भारत में कम पड़ रही हैं। ये दवाएं मुंह, फेफड़े, अंडाशय, अन्ननली, गर्भाशय ग्रीवा, स्तन, वृषण, पित्ताशय समेत कई सामान्य कैंसरों के उपचार की आधारशिला हैं। उन्होंने सरकार से इन जीवनरक्षक दवाओं की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने का आग्रह किया।
विशेषज्ञों के अनुसार, सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन कई प्रकार के कैंसरों के उपचार में पहली पंक्ति की कीमोथेरेपी दवाएं हैं। ऐसे में इनकी कमी से हजारों मरीजों के उपचार कार्यक्रम प्रभावित होने की आशंका है।
इसी बीच, इस मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को इन दोनों कैंसर रोधी दवाओं की कीमतें बढ़ाने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। देशभर के अस्पतालों में इन दवाओं की कमी और सप्लाई में आ रही रुकावटों को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।
डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स (DoP) के सूत्रों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि विभाग ने ड्रग्स (प्राइसेज कंट्रोल) ऑर्डर (DPCO) के पैरा 19 के तहत NPPA को पत्र लिखकर इस कदम की अनुमति प्रदान की है। सूत्रों के मुताबिक प्राइसिंग अथॉरिटी अगले कुछ दिनों में इस संबंध में अंतिम फैसला ले सकती है।
DPCO का पैरा 19 सरकार और NPPA को असाधारण परिस्थितियों में जनहित को ध्यान में रखते हुए किसी भी दवा की अधिकतम कीमत (सीलिंग प्राइस) या खुदरा मूल्य निर्धारित करने अथवा उसमें बदलाव करने का विशेष अधिकार देता है। आमतौर पर इस प्रावधान का उपयोग तब किया जाता है जब किसी दवा की उपलब्धता प्रभावित होने लगे या सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका हो।
जानकारी के अनुसार, फार्मास्युटिकल उद्योग लंबे समय से इन दोनों दवाओं की कीमतों में एकमुश्त बढ़ोतरी की मांग कर रहा था। उद्योग का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्लैटिनम और अन्य कच्चे माल की कीमतों में भारी वृद्धि के कारण वर्तमान मूल्य पर इन दवाओं का उत्पादन आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं रह गया है। इसके चलते कई कंपनियों ने उत्पादन कम कर दिया, जिससे बाजार में कमी की स्थिति पैदा हुई।
ऑन्कोलॉजिस्टों का कहना है कि यदि आपूर्ति संकट लंबा खिंचता है तो कैंसर मरीजों के उपचार में देरी हो सकती है, जिसका असर रोग नियंत्रण और मरीजों के स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ सकता है। वहीं, मरीज संगठनों ने सरकार से मांग की है कि दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का बोझ मरीजों पर न्यूनतम रखा जाए।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनरक्षक कैंसर दवाओं की उपलब्धता और वहनीयता (Affordability) के बीच संतुलन बनाना सरकार और नियामक संस्थाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। ऐसे समय में डॉ. श्याम अग्रवाल जैसे विशेषज्ञों द्वारा उठाई गई चिंता इस मुद्दे की गंभीरता को और अधिक रेखांकित करती है।