
Lucknow Bureau, Senior Reporter,
केजीएमयू में छात्र राजनीति से अपना कैरियर शुरू करने वाले डाक्टर साहब की महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो रही है। पहले लोहिया अस्पताल फिर कैंसर संस्थान। जब वहां से हटाए गए तो बलरामपुर अस्पताल में अपनी तैनाती कराई। जोड़-तोड़ में माहिर डाक्टर साहब ने अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए बलरामपुर में प्रशासिक पद हथियाया। बलरामपुर अस्पताल में कमाई के सीमित स्रोत होने के कारण उन्हें वह कुर्सी अधिक रास नहीं आई। अब निकल पड़े हैं अटल बिहारी बाजपेई चिकित्सा विश्वविद्यालय की यात्रा पर।
उत्तर प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की बात करती है मगर हकीकत यह है कि वर्तमान सरकार में हर वह फार्मूला चल रहा है जो पूर्व की सरकारों में चलता रहा है। इसी का नतीजा है कि भ्रष्टाचार से घिरे अधिकारियों कर्मचारियों को मनचाही पोस्टिंग पाने से कोई रोक नहीं पाता। इसका उदाहरण पिछले दिनों बलरामपुर अस्पताल में देखने को मिला, जब बलरामपुर अस्पताल में प्रशासनिक पद पर तैनात एक डाक्टर यहां से तीन साल के लिए अटल बिहारी चिकित्सा विश्वविद्यालय प्रति नियुक्ति पर चले गए।
यह पहला मौका नहीं था जब वह प्रतिनियुक्ति पर किसी चिकित्सा संस्थान गए हों। इससे पहले भी वह कल्याण सिंह कैंसर संस्थान जा चुके हैं। कैंसर संस्थान में उनकी तैनाती काफी चर्चा में रही। आरोप लगे कि फर्नीचर से लेकर चिकित्सीय उपकरण खरीद में भारी अनियमितता बरती गई। इसके सूत्रधार डाक्टर साहब ही थे। इसके बाद वहां होने वाली भर्तियों में धांधली हुई, उसके आरोप भी डाक्टर साहब पर ही लगे। सबकुछ जैसे तैसे चल रहा था मगर जब वहां निदेशक के पद पर नये अधिकारी डॉ. एमएलबी भट्ट की तैनाती हुई तो उन्होंने डाक्टर साहब की प्रति नियुक्ति समाप्त कराते हुए उन्हें स्वास्थ्य विभाग में वापस भेज दिया।
बगैर पद करा ली तैनाती
स्वास्थ्य विभाग में आने के बाद साहब ने अपनी तैनाती बलरामपुर चिकित्सालय में करा ली। जिस विभाग में उन्होंने अपनी तैनाती कराई उसमें पहले से ही दो डाक्टर थे और पद भी रिक्त नहीं था इसके बावजूद अपनी पहुंच के चलते अस्पताल में तैनाती ले ली। मरीजों का इलाज करना उनकी लाइफ स्टाइल से मेल नहीं खाता था। इसी कारण उन्होंने जल्द ही प्रशासिक पद पर दावा ठोक दिया और उसे हथिया भी लिया। पद पर रहते ही उन्होंने निर्माण कार्यों के लिए प्रस्ताव बनाए, उन्हें शासन से मंजूरी नहीं मिली। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब मेन स्टोर वाली बिल्डिंग के स्थान पर नई इमारत के प्रस्ताव को शासन ने नकार दिया। डाक्टर साहब का प्लान था कि अगर इमारत के निर्माण का बजट मिल गया तो वह मोटा लाभ कमा लेंगे। शासन के साथ ही उन्होंने सांसद के घर भी पैरवी की थी मगर दोनों ही जगहों से बात नहीं बन पाई। सीमित आय के स्रोत को देखकर उन्होंने फिर से किसी चिकित्सा संस्थान जाने की योजना बनाई। संघ व शासन में अपनी पहुंच के चलते डाक्टर साहब अटल चिकित्सा विश्वविद्यालय में चले गए।
प्राइवेट प्रेक्टिस के भी लगे हैं आरोप
डाक्टर पर लम्बे समय से निजी प्रेक्टिस के आरोप लगते रहे हैं। अपनी पत्नी के नाम से चलने वाली क्लीनिक में शाम ढलते ही डाक्टर साहब भी विराजमान हो जाते हैं। बताया जाता है कि डाक्टर उसी क्लीनिक में बैठकर मरीजों को चिकित्सीय परामर्श देते हैं। पर्चे पर नाम न होने के कारण उनके विरोधी लिखित शिकायत नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि क्लीनिक में मरीजों का इलाज करते हुए उन्हें किसी भी शाम देखा जा सकता है। खुद के खिलाफ आने वाली शिकायतों को मैनेज करने के लिए डाक्टर साहब काफी खर्च भी करते हैं। मीडिया कर्मियों से लेकर अन्य प्रशासनिक अफसरों से डाक्टर साहब मासिक तौर पर मिलते जुलते रहते हैं ताकि शिकायतों को दबाने में मदद मिले।

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