देश में 80 फीसदी दिव्यांगों के पास नहीं हेल्थ इंश्योरेंस

Nearly 160 million persons with disabilities lack equal access to health insurance—both public and private—report (NCPEDP)
Nearly 160 million persons with disabilities lack equal access to health insurance—both public and private—report (NCPEDP)

 

नई दिल्ली, सेहत संवाददाता

देश के दिव्यांग स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओंसे महरूम हैं। इस बावत नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपल (NCPEDP) ने गुरूवार को एक श्वेतपत्र “Inclusive Health Coverage for All: Disability, Discrimination and Health Insurance in India” जारी किया गया। एनसीपीईडीपी ने इस संदर्भ में एक रिपोर्ट भी जारी की। यह रिपोर्ट उन असमानताओं को उजागर करती है, जो लगभग 16 करोड़ दिव्यांगजन को सार्वजनिक और निजी—दोनों प्रकार के स्वास्थ्य बीमा तक समान पहुंच से वंचित रखती है।

2023 से 2025 के बीच देशभर में किए गए एक सर्वेक्षण—जिसमें 34 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 5,000 से अधिक दिव्यांग व्यक्तियों, केस स्टडीज़, नीतिगत विश्लेषण और हितधारक परामर्श शामिल थे—के आधार पर, श्वेतपत्र एक गंभीर स्थिति सामने रखता है।

श्वेतपत्र के अनुसार देशभर में 80 फीसदी दिव्यांगजन के पास कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं है, और 53 फीसदी आवेदकों को बिना किसी स्पष्ट कारण बताए आवेदन अस्वीकार कर दिया जाता है। संविधानिक गारंटी, भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) के निर्देशों और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (2016) के प्रावधानों के बावजूद, दिव्यांगजन अब भी भेदभावपूर्ण अंडरराइटिंग प्रक्रियाओं, अत्यधिक प्रीमियम, बीमा प्लेटफॉर्मों की अनुपलब्ध पहुंच और योजनाओं की अपर्याप्त जानकारी जैसी बाधाओं का सामना करते हैं।

कई आवेदकों को केवल उनकी दिव्यांगता या पूर्व-स्थित स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर बीमा देने से मना कर दिया जाता है। विशेष रूप से ऑटिज़्म, मनोसामाजिक विकलांगता, बौद्धिक दिव्यांगता तथा थैलेसीमिया जैसी रक्त संबंधी स्थितियों वाले व्यक्तियों को।

एनसीपीईडीपी के कार्यकारी निदेशक अरमान अली ने कहा, “यह श्वेतपत्र एक अत्यंत महत्वपूर्ण समय पर सामने आया है। जहां एक ओर सरकार आयुष्मान भारत (PM-JAY) का विस्तार कर 70 वर्ष से अधिक सभी वरिष्ठ नागरिकों को कवर कर रही है, वहीं दिव्यांगजन—जिनकी स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशीलताएँ समान या अधिक हैं।

दिव्यांगजन को सुलभ और व्यापक स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखना केवल एक प्रणालीगत कमजोरी नहीं, बल्कि अधिकारों का उल्लंघन है। जैसे-जैसे भारत सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की ओर बढ़ रहा है, 16 करोड़ दिव्यांगजन और उनके परिवारों को समान सुरक्षा प्रदान करना कोई विकल्प नहीं, यह एक नैतिक दायित्व, संवैधानिक जिम्मेदारी और वास्तव में एक समावेशी स्वास्थ्य प्रणाली की अनिवार्यता है। भारत दिव्यांगजन के ‘बहिष्करण की लागत’ को आने वाली पीढ़ियों पर नहीं छोड़ सकता।”

श्वेतपत्र में इन चुनौतियों के समाधान हेतु कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दी गई हैं:

  • आयुष्मान भारत (PM-JAY) के तहत सभी दिव्यांग व्यक्तियों का—आयु और आय मानदंडों से परे—तत्काल समावेश।
  • मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास और सहायक उपकरणों के लिए बेहतर कवरेज।
  • IRDAI में एक समर्पित Disability Inclusion Committee का गठन।
  • बीमा प्रदाताओं एवं स्वास्थ्यकर्मियों के लिए दिव्यांगजन-सेंसिटिव सेवा प्रदायन पर व्यापक जागरूकता।
  • सभी निजी बीमा कंपनियों में दिव्यांगजन-अनुकूल नीतियों हेतु मानकीकृत प्रीमियम, तथा अनिवार्य प्रक्रियाओं को पूर्णतः सुलभ बनाना।

एनसीपीईडीपी ने नीति निर्माताओं, नियामकों और मीडिया से आग्रह किया है कि वे दिव्यांगजन-समावेशी स्वास्थ्य बीमा पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को बढ़ावा दें और परोपकार-आधारित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर अधिकार-आधारित स्वास्थ्य पहुंच की दिशा में कदम उठाएं।

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