साधारण जुखाम कब बन जाता है ब्रायनकाइटिस?

  • वन एअरवे, वन डिसीस के आधार पर शरीर पर हमला करती है रेस्पेरेटरी एलर्जी

नई दिल्ली

साधारण, नजला और जुखाम से पीड़ित साठ से 70 प्रतिशत लोग ब्रायनकाइटिस के शिकार हो जाते हैं, जिसकी वजह है नाक से शरीर में प्रवेश करनी वाली एलर्जी की सही समय पर जांच और इलाज न होना। इस कांसेप्ट को डॉक्टर्स वन एअरवे, वन डिसीस के नाम से जाते हैं, मसलन सांस के जरिए फेफड़े तक पहुंची एलर्जी इलाज न होने पर गंभीर संक्रमण की वजह बन जाती है। एलर्जी के कई प्रकार में रेस्पेरेटरी एलर्जी सबसे आम हैं, देश में तीस से चालीस प्रतिशत लोग सामान्यत: किसी न किसी तरह की एलर्जी के शिकार हैं, जिनकी सही समय पर जांच नहीं होती।

एलर्जी के प्रकार, जांच और इलाज सहित विभिन्न विषयों को लेकर पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट में एक से पांच सितंबर के बीच 49वें वर्कशाप ऑन रेस्पेरेटरी एलर्जी डायग्नोसिस एंड मैनेजमेंट का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के एमडी और विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस बारे में पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक और कार्यक्रम के सह संयोजक डॉ राजकुमार ने बताया कि कई तरह की एलर्जी के रेस्पेरेटरी एलर्जी को सामान्य माना जाता है, जिसकी सही समय पर पहचान नहीं होने पर अस्थमा, सीओपीडी या फिर ब्रायनकाइटिस हो सकता है, सेमिनार के माध्यम से अधिक से अधिक ऐसे चिकित्सकों को एलर्जी के इलाज के एसओपी से जोड़ना है, जिनके पास सबसे पहले मरीज पहुंचते हैं। साधारण जुकाम या राइनाइटिस के शिकार अधिकांश मरीज पहले ईएनटी डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, यदि ईएनटी डॉक्टर सही जांच कर इलाज शुरू कर दें तो मरीज को गंभीर अवस्था से बचाया जा सकता है। इसके लिए पल्मोनोलॉजिस्ट के साथ ही एलर्जी के इलाज से ईएनटी विशेषज्ञों को भी जोड़ने पर अधिक जोर दिया जा रहा है। प्रदूषण और एलर्जी के विषय पर डॉ राजकुमार ने कहा कि सीधे तौर पर प्रदूषण और एलर्जी का आपस में कोई संबंध नहीं है, लेकिन जिनको एलर्जी होती है वायु प्रदूषण बढ़ने से वह आसानी से ट्रिगर हो जाती है, इसलिए एलर्जी के शिकार लोगों को प्रदूषण से बचने के सलाह दी जाती है। दिल्ली में राइनाटिस, फूड एलर्जी के साथ ही पोलेन डस्ट आदि कई तरह की एलर्जी देखी जाती है।

 

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