
नई दिल्ली, परिमल कुमार
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में हर छठा व्यक्ति इंफर्टिलिटी यानी बाँझपन से प्रभावित है। वैश्विक स्तर पर 15% दंपति इस समस्या का सामना कर रहे हैं। भारत में यह आँकड़ा 3.9% से लेकर 16% तक के बीच अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकता है। बाँझपन की समस्या समय के साथ तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसका इलाज भी अब संभव है। इसी गंभीर विषय पर चर्चा के लिए सीनियर पत्रकार परिमल कुमार ने AIIMS की MD-PhD Lab for Molecular Reproduction and Genetics की प्रोफेसर, डॉ. रीमा दादा से विस्तृत बातचीत की।
बांझपन को बढ़ावा देता गलत खानपान
क्या आज का खानपान वैवाहिक जीवन पर असर डाल रहा है?
इस सवाल पर डॉ. रीमा दादा कहती हैं कि गलत खानपान या अनियमित डाइट, जिसे फास्ट फूड डाइट कहते हैं, अक्सर “स्टैंडर्ड अमेरिकन डाइट” या “डेडली अमेरिकन डाइट” के नाम से जानी जाती है। यह डाइट बहुत अधिक inflammatory होती है, जिससे oxidative stress (ऑक्सिडेटिव तनाव) बढ़ता है। इसके साथ ही, इसमें ट्रांस फैट और शुगर की मात्रा अत्यधिक होती है।
आजकल लोगों की आदतें भी बदल गई हैं। पहले लोग कभी-कभार बाहर जाकर खाना खाते थे, लेकिन अब Zomato और Swiggy जैसी सुविधाओं के कारण घर पर बैठे-बैठे बाहर का खाना मंगाना बहुत आसान हो गया है। इससे लोग पहले की तुलना में अधिक बार बाहर का खाना खा रहे हैं और मोटापे का शिकार हो रहे हैं।
इसके अलावा, अगर हमारी जीवनशैली में धूम्रपान, शराब का सेवन, अत्यधिक मोबाइल फोन का इस्तेमाल, मानसिक तनाव, और प्रदूषण शामिल हैं, तो यह भी शुक्राणु की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाते हैं। हवा में मौजूद भारी धातुएं और प्रदूषक तत्व हमारे शुक्राणु को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं।
डॉ. रीमा कहती हैं कि शुक्राणु शरीर का एक ऐसा हिस्सा है, जो अपनी क्षति को खुद से ठीक नहीं कर पाता। ऐसे में यह जरूरी है कि हम अपनी डाइट और जीवनशैली में सुधार करें ताकि बाँझपन जैसी समस्याओं से बचा जा सके।
डॉ. रीमा दादा बताती हैं कि शुक्राणु का डीएनए बहुत compact होता है, जिसके कारण उसमें केवल एक ही repair mechanism सक्रिय रहता है, जिसे base excision repair mechanism कहा जाता है। इसके अलावा अन्य सभी repair mechanisms निष्क्रिय (silent) हो जाते हैं। हालांकि, धूम्रपान जैसे कारण इस सक्रिय प्रक्रिया को भी बाधित कर देते हैं। बीड़ी और सिगरेट में पाए जाने वाले cadmium जैसे जहरीले तत्व इस repair mechanism को निष्क्रिय बना सकते हैं, जिससे शुक्राणु का डीएनए क्षतिग्रस्त हो जाता है।
एक और प्रमुख कारण जो बाँझपन को बढ़ा रहा है, वह है देर से शादी करना। जब पिता की उम्र बढ़ जाती है, तो शुक्राणु में डीएनए क्षति धीरे-धीरे accumulate (जमा) होती रहती है। ऐसे में, इस क्षति को ठीक करना मां के अंडे की क्षमता पर निर्भर करता है। लेकिन अगर मां की उम्र भी अधिक हो, तो अंडे की repair capacity कम हो जाती है।
इस स्थिति में, अगर डीएनए में क्षति अधिक होती है और उसे ठीक नहीं किया जा सकता, तो इससे बाँझपन की समस्या उत्पन्न होती है। इसी कारण उम्र बढ़ने के साथ कपल्स में बाँझपन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। आपका खानपान: आपकी ही नहीं, आने वाली पीढ़ी की सेहत का भी आधार
डॉ. रीमा दादा के अनुसार, पहले यह माना जाता था कि केवल वे genes जो हम अपने माता-पिता से प्राप्त करते हैं (inheritance), हमारी अगली पीढ़ी की सेहत और जीवनशैली को तय करते हैं। अगर माता-पिता स्वस्थ हैं और किसी बीमारी से ग्रसित नहीं हैं, तो उनकी genes अगली पीढ़ी को स्वस्थ रखते हैं।
लेकिन अब epigenetics का नया कॉन्सेप्ट आया है। इसका मतलब है कि हमारे विचार, भावनाएं, और खानपान जैसे फैक्टर भी हमारी genes की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। जब हम अच्छी आदतें अपनाते हैं, जैसे कि पौष्टिक खाना, सकारात्मक सोच, और एक स्वस्थ जीवनशैली, तो हमारे genes में ऐसे प्रोग्राम सक्रिय हो जाते हैं जो हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। यह DNA repair mechanisms को भी बेहतर बनाता है।
इसके विपरीत, गलत खानपान और आदतें हमारे DNA की गुणवत्ता को खराब कर देती हैं। यही कारण है कि आजकल डायबिटीज़, अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियां अधिक देखने को मिल रही हैं।
डॉ. दादा यह भी बताती हैं कि बच्चों में Hyperactivity Disorder, बचपन का डिप्रेशन (Childhood Depression), और अन्य मानसिक समस्याओं का संबंध भी पिता के खराब DNA quality से पाया गया है।
इसलिए, यह समझना जरूरी है कि हमारी जीवनशैली और खानपान न केवल हमें, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ी को भी गहराई से प्रभावित करते हैं।
योग बन सकता है आपके जीवन को नई दिशा देने वाला माध्यम
डॉ. रीमा दादा के अनुसार, योग एक ऐसी जीवनशैली और प्रक्रिया है जो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक पहलुओं को संतुलित करने में मदद करती है। उन्होंने अपनी studies में पाया है कि योग न केवल शारीरिक तनाव, बल्कि oxidative stress को भी प्रभावी रूप से कम करता है।
डॉ. दादा बताती हैं:
- केवल 21 दिनों की नियमित योग प्रैक्टिस से oxidative stress काफी हद तक कम हो जाता है।
- योग gene expression को सामान्य करता है।
- हालांकि, DNA damage को पूरी तरह से ठीक होने में लगभग 6 महीने का समय लग सकता है।
- इसलिए, जिस तरह हम रोज़ ब्रश करते हैं और नहाते हैं, उसी तरह योग को भी अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए।
आसान योगाभ्यास से शुरुआत करें
परिमल कुमार द्वारा पूछे गए सवाल पर कि यदि कोई व्यक्ति इस साक्षात्कार को पढ़कर या देखकर योग शुरू करना चाहे तो वह किन आसनों से शुरुआत करे, डॉ. दादा ने सुझाव दिया:
- सूर्य नमस्कार
- प्राणायाम
- अनुलोम-विलोम
- इसके बाद ध्यान (मेडिटेशन) के लिए कुछ समय निकालें।
बांझपन अब न केवल महिलाओं, बल्कि पुरुषों को भी समान रूप से प्रभावित कर रहा है। इसका मुख्य कारण है नकारात्मक जीवनशैली।
- योग इस समस्या से लड़ने में एक प्रभावी उपाय साबित हो सकता है।
- सही आदतों और उपचारों का पालन करके बांझपन को दूर किया जा सकता है।
लेख्रक पत्रकार और Kiddocracy के संस्थापक हैं

Parimal Kumar, Senior Journalist